Thursday 30 August 2012

पदोन्नति में आरक्षण उचित नहीं..

अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को पदोन्नति में आरक्षण का राजनीतिक खेल खेलकर भयंकर राजनीतिक और आर्थिक घोटालों में फंसी केंद्र सरकार देश की जनता का ध्यान अपनी करतूतों की तरफ से हटाने के लिए एक बार फिर ...See More www.railsamachar.com

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Saturday 25 August 2012

रेलवे बोर्ड ने अधिकारियों का मनोबल तोडा..

रेलवे बोर्ड की अफसरशाही राजनीति का शिकार हुए शुभ्रांशु..

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हमारे सभी माननीय पाठकों से अनुरोध है की वे अब 'रेलवे समाचार' को इसकी वेबसाइट..

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पर पढ़ें.. इससे उन्हें बहुत आसानी होगी और उन्हें रेलवे संबंधी ज्यादा खबरें पढ़ने को मिलेंगी..

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Thanks & Regards
Suresh Tripathi
Editor
Railway Samachar
Contact - 09869256875

Friday 11 May 2012


"भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन" विषय पर राष्ट्रीय सेमिनार संपन्न 

भारतीय रेल का राजनीतिक दोहन बंद किया जाए -शिवगोपाल मिश्रा 

मुंबई : राष्ट्रीय पाक्षिक 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' द्वारा "भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन" जैसे अत्यंत समसामयिक विषय पर बुधवार, 9 मई को वाई. बी. चव्हाण प्रतिष्ठान सभागृह, मंत्रालय के पास, जनरल जे. एन. भोसले मार्ग, नरीमन पॉइंट, मुंबई में राष्ट्रीय सेमिनार का सफल आयोजन किया गया. इस महत्वपूर्ण सेमिनार में भारतीय रेल के उच्च अधिकारी और सभी पांचो मान्यताप्राप्त फेडरेशनों के पदाधिकारियों सहित बड़ी संख्या में रेल कर्मचारी और यात्री संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया. सेमिनार में मुंबई से म. रे. के मुख्य कार्मिक अधिकारी/प्रशासन श्री रविन्द्र कुमार, 'नवभारत टाइम्स' के संपादक श्री सुंदर चंद ठाकुर, पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार, मध्य रेलवे के महाप्रबंधक श्री सुबोध कुमार जैन, दिल्ली से डेडिकेटेड फ्रेट कारीडोर कारपोरेशन इंडिया लिमिटेड (डीएफसीसी) के निदेशक श्री पी. एन. शुक्ल, आल इंडिया रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स एसोसिएशन (एआईआरपीएफए) के महासचिव श्री यू. एस. झा, अध्यक्ष श्री एस. आर. रेड्डी, लखनऊ से आल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन (एआईआरएफ) के महासचिव का. शिवगोपाल मिश्रा, आल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन (एआईआरएफ) के सहायक महासचिव और नेशनल रेलवे मजदूर यूनियन (एनआरएमयू) के महासचिव का. श्री पी. आर. मेनन, नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इंडियन रेलवेमेंस (एनएफआईआर) के सहायक महासचिव और पश्चिम रेलवे मजदूर संघ के महासचिव श्री जे. जी. माहुरकर, पटना से इंडियन रेलवे प्रमोटी ऑफिसर्स फेडरेशन (आईआरपीओएफ) के अध्यक्ष श्री जे. पी. सिंह, और महासचिव श्री जीतेन्द्र सिंह, चेन्नई से दक्षिण रेलवे के मुख्य यातायात प्रबंधक श्री अजीत सक्सेना आदि प्रबुद्ध वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए.  

रेल प्रबंधन के उपरोक्त सभी विशेषज्ञ और औद्योगिक शांति एवं उत्पादन में भागीदार सभी कर्मचारियों एवं अधिकारी संगठनों के पदाधिकारियों ने इस सेमिनार में शामिल होने की अपनी पूर्व सहमति प्रदान की थी. सभी वक्ताओं ने कहा कि इस अत्यंत समसामयिक परिचर्चा में बहुत महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए हैं, जिन पर विचार और अमल करने से भारतीय रेल के उत्थान में रेल प्रशासन को अवश्य मदद मिलेगी. सभी कर्मचारियों एवं अधिकारी संगठनों के पदाधिकारियों ने कहा कि जो पहल हम लोगों को करनी चाहिए थी, वह 'परिपूर्ण रलवे समाचार' ने की है. इसे अब और आगे बढ़ाया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि भारतीय रेल विषय पर पिछले 15 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रहे एकमात्र पाक्षिक 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' ने भारतीय रेल के पुनरुत्थान जैसे विभिन्न समसामयिक विषयों पर सेमिनारों का आयोजन करके रेल प्रशासन और रेल व्यवस्था के हित में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है. मंच पर उपस्थित सभी अधिकारियों और कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों ने गलत नीतियों और भारतीय रेल के राजनीतिक दोहन के खिलाफ एकजुट होकर अपनी एकता को मजबूत करने पर जोर दिया. श्री रविन्द्र कुमार ने मानव संसाधन विषय पर अपने महत्वपूर्ण विचार रखे, जबकि श्री सुंदरचंद ठाकुर ने सर्वसामान्य यात्रियों की सुविधाएं बढाए जाने और फालतू खर्चों में कटौती की बात कही. श्री पी. एन. शुक्ल ने डीएफसीसी की प्रगति के माध्यम से भारतीय रेल में काम करने और श्री अजीत सक्सेना ने आध्यात्मिक तरीके से व्यक्तिगत चरित्र के निर्माण की बात कही. 

पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार और मध्य रेलवे के महाप्रबंधक श्री सुबोध कुमार जैन ने अत्यंत सरल तरीके से अपनी बात कही. उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि रेलवे की हालत काफी ख़राब है, मगर यह भी कहा कि ऐसा नहीं है कि इसमें सुधार नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा कि रेलवे में अच्छे लोगों की कोई कमी नहीं है. श्री यू. एस. झा और श्री जे. पी. सिंह ने पूर्व वक्ताओं द्वारा कही गई बातों का समर्थन करते हुए कहा कि यदि रेल प्रशासन ने तुरंत कोई करेक्टिव एक्शन नहीं लिया तो हालत और बिगड़ सकती है. इस अवसर पर एआईआरएफ के अध्यक्ष और वयोवृद्ध ट्रेड युनियनिस्थ का. उमरावमल पुरोहित ने भी जोश में आकर काफी ओजस्वी भाषण दिया, हालांकि वह सिर्फ सेमिनार में होने वाली परिचर्चा का अध्ययन करने आए थे. सेमिनार के अध्यक्ष का. शिवगोपाल मिश्रा ने अंत में अपने संबोधन में कहा कि अत्यंत सीमित मैन पावर और संसाधनों के बावजूद 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' ने भरतीय रेल के पुनरुत्थान की जो पहल की है, उसे आगे बढ़ाया जाएगा. उन्होंने कहा कि यदि समय रहते भारतीय रेल के राजनीतिक दोहन को नहीं रोका गया तो इसे एयर इंडिया और इंडियन एयर लाइंस के रास्ते पर जाने से नहीं रोका जा सकेगा. उन्होंने यह भी कहा कि यदि रेल प्रशासन ने कर्मचारी और अधिकारी संगठनों की वाजिब मांगों को नहीं माना तो रेल का चक्का जाम करने पर भी हम विचार करने से नहीं हिचकिचाएंगे. 

फोटो परिचय : 

1. 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' के सेमिनार विशेषांक का विमोचन करते हुए बाएँ से आईआरपीओएफ के अध्यक्ष श्री जे. पी. सिंह, डीएफसीसी के निदेशक श्री पी. एन. शुक्ल, प. रे. के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार, म. रे. के महाप्रबंधक श्री सुबोध कुमार जैन, एआईआरएफ के महाचासचिव का. श्री शिवगोपाल मिश्रा और एआईआरपीएफए के महासचिव श्री यू. एस. झा. इस अवसर पर श्री रविन्द्र कुमार, श्री पी. आर. मेनन, श्री अजीत सक्सेना, श्री एस. आर. रेड्डी, श्री जे. जी. माहुरकर और श्री जीतेन्द्र सिंह भी उपस्थित थे. 


2. 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' द्वारा "भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन" विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के मंच पर उपस्थित दाएं से एआईआरपीएफए के महासचिव श्री यू. एस. झा, एआईआरएफ के महाचासचिव का. श्री शिवगोपाल मिश्रा, म. रे. के महाप्रबंधक श्री सुबोध कुमार जैन, प. रे. के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार, डीएफसीसी के निदेशक श्री पी. एन. शुक्ल. 

3. 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' द्वारा "भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन" विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के मंच पर उपस्थित दाएं से द. रे. के सीटीएम श्री अजीत सक्सेना, म. रे. के सीपीओ/ए श्री रविन्द्र कुमार, एनआरएमयू के महासचिव का. पी. आर. मेनन, आईआरपीओएफ के महासचिव श्री जीतेन्द्र सिंह, एआईआरपीएफए के महासचिव श्री यू. एस. झा, एआईआरएफ के महाचासचिव का. शिवगोपाल मिश्रा, म. रे. के महाप्रबंधक श्री सुबोध कुमार जैन, प. रे. के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार, डीएफसीसी के निदेशक श्री पी. एन. शुक्ल, आईआरपीओएफ के अध्यक्ष श्री जे. पी. सिंह, डब्ल्यूआरएमएस के महासचिव श्री जे. जी. माहुरकर और  एआईआरपीएफए के अध्यक्ष श्री एस. आर. रेड्डी. 

Saturday 5 May 2012


भारतीय रेल का पुनरुत्थान...

ऐसा क्या हो गया है कि आज सब तरफ भारतीय रेल के पुनरुत्थान की बात की जा रही है? पुनरुत्थान की बात क्यों हो रही है, क्या संसाधन कम हो गए हैं? इस चिंता का कारण आखिर क्या है? क्या इस महान संस्था के प्रति हमारी संवेदना कम हो रही है? क्या हमारा स्वार्थ हम पर हावी हो रहा है? संस्था के लिए हमारी जवाबदेही और वफादारी क्यों कम हो रही है? आखिर क्या कारण है की आज एक अख़बार (परिपूर्ण रेलवे समाचार) को इसके पुनरुत्थान के लिए आगे आकर सार्वजनिक परिचर्चा का आयोजन करना पड़ रहा है? इसका कारण शायद यह है कि इस महान संस्था के अधिकतर लोग परजीवी हो गए हैं. यह परजीवी लोग दूसरों पर निर्भर हो गए हैं. यह बात इस संस्था से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होती है, वह चाहे मंत्री हो, चाहे अधिकारी हो या कर्मचारी हो, इसके लिए इनमें से कोई एक व्यक्ति दोषी नहीं है. सब एक-दूसरे की आड़ ले रहे हैं, किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि करना क्या है? किसी को सही गलत का भान नहीं रह गया है. कोई यह सोचकर कि वह सिर्फ टहनी काट रहा है, इससे पेड़ को कोई फर्क नहीं पड़ेगा. कोई पत्ते नोंच रहा है, तो कोई छाल छील रहा है, और कोई अगर मजबूत स्थिति में है तो वह तना काटने पर तुला है, और जो जड़ों में मट्ठा डालने की हालत में है, तो वह वैसा भी कर रहा है. अपने इस तरह के कृत्य से सब यह मानकर चल रहे हैं कि इससे पेड़ (संस्था) को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. मगर इनमें से कोई यह नहीं सोच रहा है कि जब संस्था (भारतीय रेल) ही नहीं बचेगी, तब उनका क्या अस्तित्व रह जाएगा?  

जो कुछ तथाकथित अच्छे लोग हैं, वह कोई वाजिब निर्णय नहीं लेना चाहते हैं, वह डरे हुए हैं. वह या तो अधर्म का साथ दे रहे हैं अथवा उसकी खुशामद में लगे हैं, या फिर कुछ पाने की इच्छा या खोने के डर से निहितस्वार्थवश चुप्पी साधे हुए हैं और निरीह जिंदगी जी रहे हैं. मगर जो ख़राब लोग हैं उन्हें कोई डर नहीं है, वह निःशंक भाव से अधर्म में लगे हैं. दूर-दूर तक ऐसा कोई व्यक्तित्व नजर नहीं आ रहा है, जिससे कोई उम्मीद की जा सके. पिछले 15 वर्षों में जब से यह 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' प्रकाशित हो रहा है, तब से लेकर अब तक भारतीय रेल में एक भी व्यक्तित्व ऐसा नजर नहीं आया है, जिसे प्रेरणा स्रोत माना जा सके. हम यहाँ रेलवे के मान्यताप्राप्त फेडरेशनों के पदाधिकारियों की बात नहीं कर रहे हैं, क्योंकि वह कोई प्रशासकीय निर्णय लेने की जगह पर नहीं हैं. हम यहाँ उच्च प्रशासनिक पदों पर विराजमान अधिकारियों की बात कर रहे हैं, जो वास्तव में तमाम प्रशासनिक निर्णय लेने की स्थिति में हैं. परन्तु फिर भी वे दिशाहीन हैं और उनमें दूरदर्शिता एवं पारदर्शिता का भारी आभाव है. वे राजनीतिक नेतृत्व की हाँ में हाँ मिला रहे हैं और संस्था को डुबा रहे हैं. यहाँ तक कि जब मान्यताप्राप्त फेडरेशनों ने बढ़ा हुआ रेल किराया वापस लिए जाने की स्थिति में उसकी भरपाई केंद्रीय बजट से किए जाने की मांग की, तब भी यह लोग उनके साथ एकजुट नहीं हुए. इसको क्या समझा जाए, क्या इसका मतलब यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि ये लोग सिर्फ अपनी नौकरी बचाने और अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हुए है? 

राजनीतिक गठबंधन से ही सिर्फ भारतीय रेल का बंटाधार नहीं हुआ है, बल्कि अंतर-विभागीय प्रतिस्पर्धा और लाग-डाट ने भी भारतीय रेल का पूरी तरह से बंटाधार कर रखा है. एक तरफ राजनीतिक गठबंधन की मज़बूरी ने पिछले 15-20 वर्षों से भारतीय रेल को राजनीतिक चारागाह बनाकर रखा है, तो दूसरी तरफ नौकरशाही ने इसका फायदा उठाते हुए इस चारागाह में अपनी रोटियां भी खूब सेंकी हैं. मंत्री किराया नहीं बढ़ाएगा, वह प्रधानमंत्री की बात मानने के बजाय अपनी पार्टी सुप्रीमो के मार्गदर्शन में चलेगा, तो उसके मातहत उसकी नौकरशाही अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही को भुलाकर सिर्फ उसके आगे-पीछे चलेगी और उसकी हर उलटी-सीधी बात को नियम-कानून का जामा पहनाकर लागू करेगी, फिर चाहे उससे संस्था का बंटाधार ही क्यों न हो जाए. यही वजह है कि पूरी तरह अयोग्य और कदाचारी होते हुए भी एक अधिकारी पहले मेम्बर बनने में कामयाब हो जाता है, और बाद में उसी तरीके से सर्वोच्च पद को हथियाकर मेम्बर के पद को भी वर्षों तक हड़पकर अपने पास रखता है और पूरी व्यवस्था उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती है. इसके लिए किसी बाहरी व्यक्ति को अदालत की शरण में जाना पड़े, इससे बड़ा दुर्भाग्य इस संस्था का और क्या हो सकता है? उच्च पदों पर राजनीतिक स्वार्थ और भ्रष्टाचार के जरिए कदाचारी एवं अयोग्य लोगों का बैठाया जाना और इसके लिए योग्य, कर्मठ तथा ईमानदार लोगों को दरकिनार करना, और ऐसे लोगों (प्रधानमंत्री) का चुप रह जाना भी, भारी राजनीतिक, प्रशासनिक और व्यवस्थागत चारित्रिक गिरावट का प्रतीक है. 

ऐसा भी नहीं है कि इस महान संस्था में अच्छे, ईमानदार और कर्मठ लोगों की कोई कमी है. जब ऐसे लोगों को मौका मिलता है, या मौका दिया जाता है, तो वह वो काम करके दिखा देते हैं जिसके बारे में पहले से ही यह मान लिया जाता है या कहा जाता है कि वैसा नहीं हो सकता. ऐसा कोई अधिकारी जब कार्यकारी पद पर आता है तो मुंबई मंडल में कल्याण स्टेशन के एक नंबर प्लेटफार्म से मेल-एक्सप्रेस गाड़ियाँ चलने लगती हैं. झाँसी मंडल की कैटरिंग आय प्रतिमाह 6 लाख से बढ़कर 30 लाख तक पहुँच जाती है. मगर इस सब के चलते कुछ अधिकारियों सहित उनके बीवी-बच्चे बिना जिम में गए ही दुबले-पतले और छरहरे हो जाते हैं, क्योंकि रोज सबह उन्हें रेलवे कैफेटेरिया से दूध, ब्रेड-बटर और और आमलेट का नास्ता मिलना बंद हो जाता है. बढ़िया बासमती चावल और तमाम राशन उनके घरों में नहीं पहुँच पाता है. दिल्ली स्टेशन की हालत सुधार जाती है, जिसके बारे में सीएजी की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि वैसी ही व्यवस्था सभी रेलों और रेलवे स्टेशनों पर लागू की जानी चाहिए. जबकि अधर्मी और भ्रष्ट लोगों के चलते जब तक ट्रांसफार्मर आते हैं, तब तक करोड़ों का केबल पड़े-पड़े सड़ जाता है और नदी पर बनाए जा रहे रेलवे पुल का एक कुआँ आठ मीटर नीचे धंस जाने के बावजूद एक चीफ इंजीनियर महोदय द्वारा न सिर्फ उस ठेकेदार की दो करोड़ की पेनाल्टी माफ़ कर दी जाती है, बल्कि ठेके को शार्ट क्लोजर और वर्क कम्पलीशन सर्टिफिकेट देकर उसकी ढाई करोड़ की परफार्मेंस गारंटी भी रिलीज कर दी जाती है, मगर महाप्रबंधक महोदय इसकी जानकारी देने वाले की कॉल रिसीव करने की जहमत भी नहीं उठाना चाहते हैं, जब मामले को जाँच एजेंसियों की तरफ बढ़ता देखा जाता है, तो सम्बंधित चीफ इंजीनियर को दूसरी जगह शिफ्ट करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है. 

कोई महाप्रबंधक या अधिकारी बहुत शरीफ है, बहुत ईमानदार है, मगर वह अपने जोन या विभाग का बंटाधार सिर्फ इसलिए करके चला जाता है, क्योंकि उसे मेम्बर या विभाग प्रमुख बनने से बायपास किया गया था. कोई विभाग प्रमुख अपनी चरित्रहीनता के लिए जाना जाता है, तो कोई काम न करने के लिए अपनी पहचान बना रहा होता है, भले ही उसके मातहत अधिकारी और कर्मचारीगण कितने ही हतोत्साहित क्यों न हो रहे हों. कोई रेलवे बोर्ड में बैठकर अयोग्य मगर अपने चात्तुकार लोगों को अपने भविष्य की प्लानिंग के तहत जोनो में विभाग प्रमुख के पदों पर सम्बंधित विभाग के मेम्बर की पोस्टिंग होने से कुछ पहले बैठा देता है, तो कोई अंधे के हाथ बटेर लग जाने वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए सर्वोच्च पद पर पहुँच जाता है. कोई अपने विभाग के सर्वोच्च पद पर होते हुए भी तमाम जानकारी के बावजूद किसी कदाचारी जूनियर अधिकारी को नहीं हटा पाता है. कोई वहां पहुंचकर भी उससे ऊपर पहुँचने की लालसा में तमाम जोड़-तोड़ के चलते अपनी रही-सही गरिमा भी खो बैठता है. राजनीतिक वरदहस्त के चलते कोई समय से पहले और कई योग्य लोगों को बायपास करते हुए जब मेम्बर बनने में कामयाब हो जाता है तो उसका सारा ध्यान अपने राजनीतिक आका की इच्छापूर्ति में ही लगा रहता है, वह संस्था की भलाई के बारे में फिर कभी सोच भी नहीं पाता है अथवा तब उसे ऐसा करने की जरूरत ही नहीं रह जाती है. इस सब परिप्रेक्ष्य में संस्था (भारतीय रेल) कहाँ गुम हो जाती है, इसका किसी को कोई ख्याल ही नहीं रह जाता है. 

सत्ता का नशा जब आदमजात के पूर्वजों यानि बंदरों में पाया गया है, तो 'बन्दर की औलाद' यानि 'आदमी' में यह न पाया जाता, तो शायद ताज्जुब होता. ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने हाल ही में बबूनो जाति के अफ़्रीकी बंदरों पर किए गए एक अध्ययन में पाया है कि दिमाग पर सत्ता का प्रभाव कोकीन के नशे जैसा होता है. अध्ययन में पाया गया है कि सत्ता का नशा बंदरों के दिमाग में टेस्टेटेरान हार्मोंस का लेवल उसी तरह से बढ़ा देता है जैसा कोकीन का सेवन करने से बढ़ जाता है. ये बढ़े हुए हार्मोंस दिमाग में डोपामाइन नामक केमिकल का लेवल बढ़ा देते हैं, जिससे बन्दर अधिक आक्रामक और सेक्स में ज्यादा सक्रिय हो जाता है. इससे उनका व्यवहार भी बदल जाता है. सत्ता का ऐसा ही प्रभाव आदमी और रेल अधिकारियों में भी देखा जा सकता है. बड़े-बुजुर्ग तो पहले ही इस पर 'सत्ता का नशा सिर चढ़कर बोलता है' जैसा एक मुहावरा बना गए हैं. और यह भी सच है कि उनके बनाए हुए ऐसे मुहावरे या कहावतें आजतक कभी झूठी साबित नहीं हुई हैं. सर्वसामान्य लोग और उसके मातहत इस बात से अक्सर दुखी दिखाई देते हैं कि कोई सरकारी अधिकारी या उनका 'बॉस' उनके साथ अजीब ढंग से क्यों पेश आता है? उन्हें उसका यह आक्रामक व्यवहार समझ में नहीं आता है. परन्तु इस अध्ययन के बाद अब तो यह समझ में आ जाना चाहिए कि हमारे राजनेता और सरकारी अधिकारी आम आदमी के साथ क्यों एक अलग तरह का व्यवहार करते हैं और एक बार कुर्सी या पद मिल जाने के बाद एक दिन उसके चले जाने का ख्याल भी उनके मन में क्यों नहीं आता है. लेकिन जिस प्रकार ऊँची सत्ता अथवा ऊँचा पद या प्रमोशन कोकीन की तरह किसी राजनेता या सरकारी अधिकारी का आत्म-विश्वास बढ़ा देता है, उसी तरह वह उनका नुकसान भी करता है. यह बात समय रहते वह समझ नहीं पाते हैं, यह तो सत्ता या पद चले जाने के बाद ही उनकी समझ में आती है. यह भी सही है कि सत्ता मिलने पर व्यक्ति चिंताग्रस्त और दिग्भ्रमित रहने लगता है, क्योंकि उसमें धैर्य की कमी हो जाती है और अहंकार पैदा हो जाता है. 

यहाँ उपरोक्त अध्ययन का उदाहरण इसलिए दिया गया है, क्योंकि हमने पिछले 15-20 सालों में भारतीय रेल के विभिन्न छोटे-बड़े पदों पर आसीन अधिकारियों और कर्मचारियों को अपने पद के अहंकार में चूर देखा है. जो व्यवहार उन्हें ऊपर से मिला होता है, वही व्यवहार वह खुद ऊपर पहुंचकर करने लगते हैं. नीचे स्तर पर रहते हुए जो बात उन्हें गलत लगती है या नागवार गुजरती है, वही उनके ऊपर पहुँच जाने पर ठीक लगने लगती है और वह भी अपने मातहतों से वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं. फिर आम आदमी तो उन्हें भुनगे की तरह नजर आने लगता है. नीचे स्तर पर रहते हुए जो अधिकारी स्टाफ वेलफेयर की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, महाप्रबंधक या बोर्ड मेम्बर बनने के बाद वही उन्हें फालतू लगती हैं. क्योंकि तब वे सर्वसुविधा संपन्न और बड़े बंगलों में रहने लगते हैं, जहाँ उनकी सिर्फ एक 'हूं' में दाल पकती है तथा उन्हें सारी सुविधाएं तुरंत मुहैया हो जाती हैं. जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड तक के अधिकारियों को भी उनसे मिल पाना दुर्लभ हो जाता है. जबकि किसी प्रभावशाली व्यक्ति का फोन आ जाने पर वह उसी तरह अपनी चेयर से उठकर खड़े हो जाते हैं जैसे कभी विभाग प्रमुख की इंटरकॉम पर आवाज सुनते ही उचक कर खड़े हो जाया करते थे, वह भी अपने सेक्रेटरी और जूनियर्स के सामने, तथापि उन्हें अपने इस व्यवहार पर लज्जा नहीं आती है. 

कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि हर हालत में सामान्य और ईमानदार बने रहने में कोई बुराई नहीं है. किसी भी स्तर पर पहुँच जाने के बाद भी इंसानियत को नहीं भुलाया जाना चाहिए. अपने पद और अपनी गरिमा का ख्याल रखते हुए भी उसका दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए. अपनी जवाबदेही और उत्तरदायित्व का पूरा पालन किया जाना चाहिए. स्टाफ और जनसामान्य के कल्याण हेतु निर्णय लेने में कोई कोताही नहीं बरती जानी चाहिए. इनका ख्याल रखने से अपनी और अपने मातहतों की उत्पादकता को बेहतर ढंग से बढ़ाया जा सकता है. जिसका लाभ अंततः संस्था को ही मिलता है. वरना जब संस्था ही नहीं रहेगी, तो पद के अहंकार और सत्ता के नशे का कोई मतलब नहीं रह जाएगा. 
-प्रस्तुति : सुरेश त्रिपाठी 
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Thursday 3 May 2012

ALL OF YOU ARE CORDIALLY INVITED...

"भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन" विषय पर 'रेलवे समाचार' 
द्वारा आयोजित सेमिनार में रेलवे के सभी मान्यताप्राप्त फेडरेशन शामिल  

मुंबई : करीब ढाई साल के एक लम्बे अंतराल के बाद 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' द्वारा "भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन" जैसे अत्यंत समसामयिक विषय पर बुधवार, 9 मई को वाई. बी. चव्हाण प्रतिष्ठान सभागृह, मंत्रालय के पास, जनरल जे. एन. भोसले मार्ग, नरीमन पॉइंट, मुंबई में राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है. इस महत्वपूर्ण सेमिनार में भारतीय रेल के उच्च अधिकारी और सभी पांचो मान्यताप्राप्त फेडरेशनों के उच्च पदाधिकारियों सहित बड़ी संख्या में रेल कर्मचारी और यात्री संगठनों के प्रतिनिधि भाग लेंगे. सेमिनार में मुंबई से 'नवभारत टाइम्स' के संपादक श्री सुंदर चंद ठाकुर, पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार, मध्य रेलवे के महाप्रबंधक श्री सुबोध कुमार जैन, दिल्ली से डेडिकेटेड फ्रेट कारीडोर कारपोरेशन इंडिया लिमिटेड के निदेशक श्री पी. एन. शुक्ल, उत्तर रेलवे के मुख्य अभियंता/मुख्यालय श्री ए. के. वर्मा, रेलवे बोर्ड के कार्यकारी निदेशक और फेडरेशन ऑफ़ रेलवे ऑफिसर्स एसोसिएशंस (एफआरओए) के महासचिव श्री शुभ्रांशु, आल इंडिया रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स एसोसिएशन (एआईआरपीएफए) के महासचिव श्री यू. एस. झा, लखनऊ से आल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन (एआईआरएफ) के महासचिव का. श्री शिवगोपाल मिश्रा, सिकंदराबाद से नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इंडियन रेलवेमेन (एनएफआईआर) के महासचिव श्री एम. राघवैया, पटना से इंडियन रेलवे प्रमोटी ऑफिसर्स फेडरेशन (आईआरपीओएफ) के अध्यक्ष श्री जे. पी. सिंह और चेन्नई से दक्षिण रेलवे के मुख्य यातायात प्रबंधक श्री अजीत सक्सेना शामिल हैं. 

रेल प्रबंधन के विशेषज्ञ और औद्योगिक शांति एवं उत्पादन में भागीदार इन सभी अधिकारियों और मान्यताप्राप्त संगठनों के पदाधिकारियों ने सेमिनार में शामिल होने की अपनी सहमति प्रदान की है. इनके अलावा भी कुछ और लोग अपने विचार इस अवसर पर रखेंगे. उम्मीद है कि इस अत्यंत समसामयिक परिचर्चा में कुछ बहुत महत्वपूर्ण सुझाव - प्रस्ताव सामने आएँगे, जिन पर विचार और अमल करने से भारतीय रेल के उत्थान में रेल प्रशासन को अवश्य मदद मिलेगी. भारतीय रेल विषय पर पिछले 15 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रहे एकमात्र पाक्षिक 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' का भारतीय रेल के पुनरुत्थान में यह एक महत्वपूर्ण योगदान होगा. उल्लेखनीय है कि वर्ष 1997 में अपने प्रकाशन के बाद से सन 2000 में 'भारतीय रेल व्यवस्था में मीडिया की भूमिका' विषय पर कल्याण में पहला सेमिनार आयोजित करके 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' ने रेल व्यवस्था में अपने योगदान की शुरुआत की थी. तत्पश्चात समय-समय पर मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम स्थित गरवारे क्लब में 'रेल संरक्षा पर सार्वजनिक संगोष्ठी' (वर्ष 2003), 'इम्प्रूविंग सेफ्टी इन रेल इंजीनियरिंग वर्क्स' (वर्ष 2004), 'सिक्योरिटी ऑफ़ सबर्बन रेल यूजर्स' (वर्ष 2005), 'रोल ऑफ़ विजिलेंस आर्गनाइजेशन इन रेलवे सिस्टम' (सिडनहम कॉलेज मुंबई, वर्ष 2006), 'सिक्योरिटी ऑफ़ रेल यूजर्स एंड डिजास्टर मैनेजमेंट' (म्यूजियम हाल, पटना, वर्ष 2007), 'सबर्बन ट्रांसपोर्ट सिनारियो इन मुंबई - प्रोजेक्ट्स एंड प्लानिंग्स' (वर्ष 2008), 'इकनामिक वायबिलिटी थ्राफ डेवेलपमेंट ऑफ़ नान-कन्वेंशनल रेवेन्यु रिसोर्सेस ऑफ़ इंडियन रेलवेज' (सिडनहम कॉलेज मुंबई, वर्ष 2009) आदि समसामयिक विषयों पर सेमिनारों का आयोजन करके 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' ने रेल प्रशासन और रेल व्यवस्था के हित में अपना अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया है. 

Saturday 14 April 2012

कंट्रोलर्स को तो हम बचा लेंगे, 

मगर हमें कौन बचाएगा...? 

कोलकाता : दो कार्पोरेट घरानों की आपसी लड़ाई में दक्षिण पूर्व रेलवे के निचले स्तर के ट्रैफिक अधिकारी उत्पीड़ित किए जा रहे हैं, जबकि जो अधिकारी वास्तव में इसके लिए जिम्मेदार रहे हैं, उनको विजिलेंस और सीबीआई की कार्रवाई से न सिर्फ बचाया जा रहा है, बल्कि आज उन्हीं के मार्गदर्शन में विजिलेंस और सीबीआई की कार्रवाई चल रही है. वरिष्ठ ट्रैफिक अधिकारियों को बचाने एवं उनकी कुटिल करतूतों को ढंकने के लिए निचले स्तर के अधिकारियों को फंसाया जा रहा है.. इससे यहाँ सभी ट्रैफिक अधिकारियों में एक प्रकार की दहशत व्याप्त है. शायद किसी को भी इस बात पर यकीन नहीं होगा कि रेक का आवंटन कंट्रोलर्स द्वारा किया जाता है, मगर द. पू. रे में यह करिश्मा हुआ है, क्योंकि वरिष्ठ ट्रैफिक अधिकारियों को बचाना है. प्राप्त जानकारी के अनुसार जो सवाल सीबीआई द्वारा सीओएम को पूछा गया था, उसका जवाब डिप्टी सीओएम/प्रोजेक्ट एंड प्लानिंग ने दिया है. सीओएम कार्यालय, गार्डेन रीच से यह जवाब 21 मार्च 2012 को सीबीआई/कोलकाता को भेजा गया है, जिसमें कहा गया है कि रेक का आवंटन चक्रधरपुर मंडल के चीफ कंट्रोलर/मिनरल श्री एम. के. राय और श्री एस. के. तिवारी ने किया था. सीबीआई ने सीओएम/द.पू.रे. को पूछा था कि मेसर्स रश्मि सीमेंट लि. को रेकों का वास्तविक आवंटन किन अधिकारियों ने किया था, उनका नाम, पदनाम, वेतनमान और वर्तमान पोस्टिंग कहाँ है, आदि जानकारी सीबीआई को मुहैया कराई जाए. इसी का उपरोक्त जवाब डिप्टी सीओएम/पीपी श्री पी. एल. हरनाथ ने दिया है. यह कितना हास्यास्पद है. 

इसी प्रकार बराजाम्दा और बड्विल के बीच ओएमडीसी साइडिंग के पास अपनी साइडिंग बनाने के लिए रश्मि सीमेंट को द. पू. रे. द्वारा भूमि का आवंटन किया गया था. यह आवंटन तत्कालीन सीओएम और सीटीपीएम ने किया था, क्योंकि इस प्रकार के काम के लिए भूमि आवंटन का अधिकार उन्हीं के पास होता है. मगर इस मामले में तत्कालीन सीओएम और सीटीपीएम को बचाने के लिए विजिलेंस ने तत्कालीन डिप्टी सीओएम/पीपी को इसमें फंसाया. टैफिक अधिकारियों में इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया जा रहा है कि साइडिंग या लैंड एलाटमेंट के लिए डिप्टी सीओएम/पीपी को कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जो कि सिर्फ फाइल पुटअप करता है? यह अधिकार तो सीओएम और सीटीपीएम का है. यहाँ यह भी जान लेना आवश्यक है कि तत्कालीन डिप्टी सीओएम/पीपी को रेलवे छोड़े (वीआरएस लिए) हुए भी कई साल हो चुके है. कोई भी अधिकारी यह नहीं बता पा रहा है कि रेक और भूमि आवंटन में गड़बड़ी कहाँ और क्या हुई है. इस मुद्दे को सभी अधिकारी एक - दूसरे पर ढ़केल रहे हैं, और अंततः अपने आपको बचाने के लिए सारा दोष इन अधिकारियों ने कंट्रोलर्स के सिर मढ़ दिया है. डिप्टी सीओएम/पीपी हरनाथ द्वारा सीबीआई को दिया गया जवाब भी कुछ इस तरह जलेबी टाइप बनाया गया है कि सीबीआई वाले खुद उसमें चकरघिन्नी बनकर रह जाएँ. इस सबका अर्थ यह लगाया जा रहा है कि जो सांप वरिष्ठ ट्रैफिक अधिकारियों की मिलीभगत से द. पू. रे. विजिलेंस ने रेंगाया था, उसे किसी तरह बिल के अन्दर घुसाया जाए, इसीलिए रश्मि ग्रुप से सम्बंधित मामलों को चकरघिन्नी की तरह घुमाया और जलेबी की तरह लपेटा जा रहा है. 

नाम उजागर न करने की शर्त पर द. पू. रे. के कुछ ट्रैफिक अधिकारियों का कहना है कि वर्तमान सीओएम के एजेंट बनकर और उनके मार्गदर्शन में काम कर रहे कुछ विजिलेंस अधिकारी सीबीआई आफिस में जाकर सीबीआई अधिकारियों को यह समझा रहे हैं कि रेलवे में ट्रैफिक अधिकारियों द्वारा चोरी कैसे की जाती है? उनका कहना है कि यहाँ यह भी जानना आश्चर्यजनक है कि ट्रैफिक विजिलेंस का अधिकारी नाकारा है, जबकि स्टोर विजिलेंस का अधिकारी समझदार है, क्योंकि वह उड़िया है, और इसीलिए उड़िया लाबी को बचाने के लिए इस सम्पूर्ण ट्रैफिक घोटाले की जांच बिरादरी भाई को जानबूझकर दिलवाई गई है. कौन कितनी लोडिंग करेगा, किसे कितने रेक आवंटित किए जाएँगे, कौन घरेलू इस्तेमाल के लिए लोडिंग करेगा, कौन निर्यात के लिए करेगा, घरेलू इस्तेमाल के लिए कहकर लोडिंग करने वाला उसे निर्यात नहीं करेगा, क्या यह सब देखना रेलवे का काम है, अथवा यह सब देखने की रेलवे को जरूरत क्या पड़ी है? रेलवे को राशनिंग करने की भी जरूरत क्या है? यह राशनिंग ही वास्तव में ट्रैफिक में भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी जड़ है. ईडी/आरएम आफिस कोलकाता कोयले के साथ 'सी' वरीयता के आयरन ओर की लोडिंग के लिए रेक का आवंटन करता है. रश्मि सीमेंट को 'सी' प्रायोरिटी के रेकों का आवंटन तत्कालीन ईडी/आरएम और वर्तमान सीओएम/द.पू.रे. ने किया था. उनका नाम अथवा उनके ईडी/आरएम के कार्यकाल का कोई उल्लेख इस घोटाले में नहीं है. 

इसी तरह रश्मि सीमेंट को साइडिंग और लैंड एलाट करने वाले तत्कालीन सीओएम और सीटीपीएम, सीएफटीएम्स के नाम भी सीबीआई की एफआईआर अथवा इस घोटाले की जांच में शामिल नहीं हैं. अधिकारी बताते है कि इनके नाम इसलिए नहीं डाले गए हैं, क्योंकि ये सभी एसएजी अधिकारी हैं, जिनके लिए रेलवे बोर्ड की अनुमति लेनी पड़ती, जो कि मिलने वाली नहीं थी. इसलिए इनके पापों का खामियाजा भुगतने के लिए निचले स्तर के अधिकारियों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है. उल्लेखनीय है कि रश्मि सीमेंट की साइडिंग का निर्माण वर्ष 2004 में हुआ था, जबकि रेलवे बोर्ड की आयरन ओर डिफरेंशियल पॉलिसी चार साल बाद वर्ष 2008 में आई थी. साइडिंग निर्माण का अनुमति पत्र मंडल से जारी किया गया था, और भूमि का आवंटन तत्कालीन सीटीपीएम ने किया था. इसमें तत्कालीन डिप्टी सीओएम/पीपी कहाँ जिम्मेदार है? सेवानिवृत्ति के कई सालों बाद विजिलेंस के दिग्भ्रमित किए जाने पर सीबीआई ने इस सेवानिवृत्त अधिकारी के घर पर छापेमारी की, जिसका कोई जवाब कोर्ट के सामने सीबीआई नहीं दे पाई और विजिलेंस के मार्गदर्शन में काम करने के कारण उसे कोर्ट के सामने शर्मिंदा होना पड़ा. कुछ अधिकारियों का तो यहाँ तक कहना है कि रश्मि ग्रुप को विधानसभा चुनावों में वामपंथियों की अपेक्षा रेलवे में काबिज राजनीतिक पार्टी को कम वित्तीय मदद देने का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, और इसीलिए उसको सबक सिखाने हेतु रेलवे विजिलेंस सहित सीबीआई का इस्तेमाल किया जा रहा है..??

इसी तरह पिछले 8-10 वर्षों में चक्रधरपुर मंडल के सीनियर डीओएम रहे अधिकारियों को अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ा है. इसका मुख्य कारण द. पू. रे. और रेलवे बोर्ड के कुछ ट्रैफिक अधिकारियों की चालाकी और बेईमानी बताई जाती है. इसके अलावा विजिलेंस के कुछ निकम्मे और अनुभवहीन अधिकारियों ने भी द. पू. रे. ट्रैफिक डिपार्टमेंट का बेड़ा गर्क करके रख दिया है. वे कुछ वरिष्ठ ट्रैफिक अधिकारियों के एजेंट बनकर रह गए हैं. उदाहरण स्वरूप एक पूर्व एसडीजीएम के कार्यकाल में दर्जनों जेएजी ट्रैफिक अफसरों को मेजर पेनाल्टी चार्जशीट दी गईं थीं, जिन्हें पढने मात्र से पता चल जाता है कि उनमें कितनी खामियां हैं. इसका मुख्य कारण यह बताया जाता है कि उक्त एसडीजीएम अत्यंत संवेदनहीन और दूसरों को हानि पहुंचाकर सुख की अनुभूति करने वाली किस्म का अधिकारी था, जिसने मात्र इसी के लिए दर्जनों ट्रैफिक अधिकारियों को फालतू विजिलेंस मामलों में फंसाया था. वर्तमान एसडीजीएम ने भी शायद ही कभी डिवीजनों में काम किया है. जबकि उनके नीचे काम करने वाले कुछ वर्तमान डिप्टी सीवीओ ने तो कभी डिवीजनों में काम ही नहीं किया है. जिन्हें ट्रैफिक विभाग के काम का और इसमें होने वाले घोटालों का कोई अनुभव नहीं है, वैसे विजिलेंस अधिकारी यहाँ ट्रैफिक अधिकारियों के भाग्य का निर्णय कर रहे हैं. 

प्राप्त जानकारी के अनुसार द. पू. रे. के वर्तमान डिप्टी सीवीओ/ट्रैफिक स्टेशन मास्टर कैडर से आए हैं. उन्होंने आजतक कभी-भी किसी भी डिवीजन में बतौर डीओएम, सीनियर डीओएम अथवा डीसीएम या सीनियर डीसीएम के रूप में काम नहीं किया है. उन्होंने अपने सेवाकाल का ज्यादातर समय पीए/सीओएम के रूप में काम करते हुए बिताया है. उन्हें परिचालन अथवा डिवीजनल वर्किंग का कोई अनुभव नहीं है. ऐसे में उन्हें जोनल विजिलेंस में ट्रैफिक और कमर्शियल ब्रांच सम्बन्धी कामकाज का चार्ज कैसे सौंपा गया? उपरोक्त उड़िया ट्रैफिक अधिकारियों सहित आजतक किसी उड़िया अधिकारी के खिलाफ कोई विजिलेंस केस क्यों नहीं बना? क्या इसका कारण डिप्टी सीवीओ/स्टोर को माना जाना चाहिए? रश्मि सीमेंट और रश्मि मेटालिक्स के मामले में सिर्फ सीनियर डीओएम/चक्रधरपुर के ही खिलाफ विजिलेंस मामला क्यों बनाया गया, क्यों नहीं तत्कालीन सीओएम, सीएफटीएमस और सीटीपीएम के खिलाफ कोई मामला बना? जबकि यह सार्वजनिक सत्य है कि चक्रधरपुर मंडल में एक भी रेक की लोडिंग द. पू. रे. मुख्यालय की पूर्व अनुमति या आदेश के बिना नहीं होती है. 

इसी प्रकार द. पू. रे. विजिलेंस के वर्तमान डिप्टी सीवीओ/स्टोर हैं, जिन्हें स्टोर का काम छोड़कर ट्रैफिक और कमर्शियल ब्रांच का विजिलेंस कार्य सौंपा गया है, ऐसे में सबसे पहला सवाल यह उठता है कि वर्तमान डिप्टी सीवीओ/ट्रैफिक को वहां बैठाकर मुफ्त में प्रति माह 60-70 हजार का वेतन क्यों दिया जा रहा है? वर्तमान डिप्टी सीवीओ/स्टोर ने भी कभी डिवीजन वर्किंग नहीं की है, और न ही उन्हें डिवीजनों में कभी बतौर सीनियर डीएमएम काम करने का कोई अनुभव प्राप्त है. बताते हैं कि उनके मार्गदर्शन में ही सीबीआई द्वारा रश्मि ग्रुप के मामलों की जांच की जा रही है, और वे लगातार सीबीआई ऑफिस में जाकर सीबीआई अधिकारियों को इन मामलों की जानकारी लेपटाप और प्रोजेक्टर पर देते हैं कि ट्रैफिक अधिकारी किस तरह से रेलवे में चोरी या घोटाला करते हैं. अधिकारी यह भी बताते हैं कि वह प्रतिदिन सीओएम के साथ दो-तीन घंटे बिताते हैं और उनके बहुत अभिन्न उड़िया मित्र भी हैं. इसीलिए न ही विजिलेंस ने और न ही सीबीआई ने वर्तमान सीओएम के खिलाफ कोई मामला दर्ज किया है. इसीलिए सीबीआई ने तत्कालीन सीटीपीएम के खिलाफ भी कोई केस नहीं बनाया है, जबकि उन्हें बचाने के लिए तत्कालीन डिप्टी सीओएम/पीपी और रेलवे से बाहर जा चुके अधिकारी के खिलाफ सीबीआई ने वर्तमान डिप्टी सीवीओ/स्टोर के ही मार्गदर्शन में रश्मि सीमेंट/रश्मि मेटालिक्स की बराजाम्दा साइडिंग के आवंटन मामले में फर्जी केस बनाया, जिसमें उसे कोर्ट के सामने शर्मिंदा होना पड़ा है. 

इसके पहले भी द. पू. रे. विजिलेंस में वर्ष 2003-05 के दौरान एस. एस. बिष्ट को डिप्टी सीवीओ/इंजी. बनाया गया था, उन्होंने भी तब तक कभी बतौर सीनियर डीईएन किसी डिवीजन में काम नहीं किया था. उनके खिलाफ भ्रष्टाचार की कई शिकायतें भी हुई थीं, शायद इसी के चलते उनके बंगला प्यून ने उनकी पत्नी को चाकू मार दिया था और तब उन्हें द. पू. रे. से निकालकर उ. रे. में शिफ्ट किया गया था. इसी प्रकार शुभेंदु चौधरी को द. पू. रे. में डिप्टी सीवीओ/मेक. बनाया गया था, उन्होंने भी कभी किसी डिवीजन में बतौर सीनियर डीएमई काम नहीं किया था. वह जब खड़कपुर वर्कशाप में पदस्थ थे, तब वहां हमेशा ही औद्योगिक अशांति का वातावरण रहा. उन्हें भी ट्रैफिक विजिलेंस का काम सौंपा गया था, जिसके परिणाम स्वरूप उन्होंने तत्कालीन सीसीएम पी. एस. राय के खिलाफ भ्रष्टाचार का केस बनाकर उन्हें प्रश्नावली दी थी, जिसके जवाब में राय ने तत्कालीन जीएम को भी अपने साथ उस मामले में लपेट लिया था. इसके फलस्वरूप जीएम को पसीना आ गया और तब जीएम चेंबर में ही बैठकर श्री राय ने शुभेंदु चौधरी को तत्काल विजिलेंस से हटवाया था, तब जीएम को उस मामले से छुटकारा मिला था. इस प्रकार द. पू. रे. विजिलेंस में लम्बे अर्से से गैर ट्रैफिक अधिकारी - ट्रैफिक अधिकारियों का भाग्य तय करते आ रहे हैं, जिसका ताजा उदाहरण वर्तमान डिप्टी सीवीओ/स्टोर और उनके कारण चकरघिन्नी बन गया रश्मि सीमेंट और रश्मि मेटालिक्स का मामला है, जिसमें अंततः कोई फुलप्रूफ नतीजा निकलता नजर नहीं आ रहा है, हाँ, यह बात अलग है कि उनके कारण कुछ जूनियर ट्रैफिक अधिकारियों की मुशीबत, तो कुछ सीनियर्स की बचत अवश्य हो रही है. 

अधिकारियों का कहना है कि रेलवे बोर्ड विजिलेंस के वर्तमान एडवाइजर श्री ए. के मोइत्रा से यह उम्मीद की जा रही थी कि वह तमाम गुटबाजी और अंतर-विभागीय राजनीति से ऊपर उठकर मेहनती, कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार ट्रैफिक अधिकारियों का बचाव करेंगे, परन्तु अब पता चल रहा है कि रेलवे बोर्ड में सालों से बैठे कुछ वरिष्ठ और चालाक ट्रैफिक अधिकारियों तथा पूर्वाग्रहों से ग्रस्त विजिलेंस के कुछ ईर्ष्यालु, बेईमान और चापलूस अधिकारियों ने उन पर भी अपना भरपूर प्रभाव बना लिया है. इसीलिए उनके नेतृत्व में द. पू. रे. के कुछ वर्तमान और पूर्व वरिष्ठ ट्रैफिक अधिकारियों को बचाने की कीमत पर जूनियर ट्रैफिक अधिकारियों की बलि चढ़ाई जा रही है? 

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रेल परिसर में पत्रकार पर हमला..

जहाँ तक रेलवे का क्षेत्र है, वहां 

तक आरपीएफ का कार्यक्षेत्र है 

मुंबई : मध्य एवं पश्चिम रेलवे के दादर स्टेशन पर दोनों रेलों के बीच स्थित मध्य रेलवे सीनियर इंस्टीट्यूट की दीवार और चारदीवारी के बीच बनाई गई अवैध कैंटीन की खबर लेने जब एक स्थानीय हिंदी दैनिक 'नवभारत टाइम्स' के वरिष्ठ पत्रकार श्री आनंद मिश्रा गुरुवार, 12 अप्रैल को वहां गए तो कुछ लोगों ने उसके साथ धक्का-मुक्की और गाली-गलौज किया, उन्हें प्रताड़ित भी किया. उनका पर्स और परिचय पत्र छीनकर फेंक दिया, उन्हें फर्जी पत्रकार बताकर दुबारा वहां आने पर जान से मारने की धमकी दी गई. यह सब उक्त अवैध कैंटीन चलाने और चलवाने वालों ने किया. पुलिस की असंवेदनशीलता एक बार फिर उजागर हुई, श्री मिश्रा को अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए चार-पांच घंटे तक तीन पुलिस स्टेशनों के चक्कर काटने पड़े. जब एक पत्रकार को अपनी शिकायत लिखाने के लिए इतनी मशक्कत करनी पड़ती है, तो आम आदमी की स्थिति का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है. इस सम्बन्ध में सूचना मिलते ही म. रे. के महाप्रबंधक श्री सुबोध कुमार जैन ने मामले का पूरा संज्ञान लिया. उन्होंने तुरंत इस बारे में मंडल प्रशासन को आवश्यक निर्देश दिए. श्री जैन ने उक्त इंस्टीट्यूट की इमारत को ही ढहा दिए जाने और वहां कोई उपयोगी निर्माण कराए जाने का फरमान भी जारी कर दिया. महाप्रबंधक श्री जैन ने स्पष्ट रूप से कहा कि जिन रेलकर्मियों को यह इंस्टीट्यूट सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए दिया गया था, उन्होंने इसे अवैध गतिविधियों का अड्डा बना दिया, हम इस सबको हमेशा के लिए ख़त्म करना चाहते हैं. परन्तु मंडल प्रशासन इस पूरे मामले में सिर्फ हीलाहवाली करता रहा और यूनियनों से समन्वय स्थापित करने की बात करता रहा, देर शाम तक उसके द्वारा इंस्टीट्यूट को सील किए जाने के दिए गए आदेश का पालन भी आरपीएफ द्वारा नहीं किया गया था. 

इस मामले की गंभीरता का सबसे ज्यादा संज्ञान राज्य के गृहमंत्री श्री आर. आर. पाटिल ने लिया, मुंबई के सैकड़ों पत्रकार एकजुट होकर उन्हें मिलने के लिए मंत्रालय में उनके चेंबर में पहुँच गए थे. श्री पाटिल तुरंत श्री आनंद मिश्रा को अपनी कार में बैठाकर बिना किसी लाव-लश्कर के ही घटना स्थल का निरीक्षण करने पहुँच गए. श्री पाटिल के इस त्वरित कदम से न सिर्फ पूरा पुलिस महकमा हड़बड़ा गया, बल्कि रेल प्रशासन को भी मामले की गंभीरता का अब अहसास हुआ. गृहमंत्री श्री पाटिल ने न सिर्फ पुलिस को चौबीस घंटों के अन्दर सम्बंधित असली आरोपियों को गिरफ्तार करने का कड़ा निर्देश दिया, बल्कि पुलिस द्वारा अपनी खाल बचाने के लिए पकड़े गए चार स्कूली बच्चों और कैंटीन में काम करने वाले दो लोगों को भी तुरंत छोड़ देने को कहा, जो कि इंस्टीट्यूट में खेलने आए थे और जिनका इस मामले से कोई सम्बन्ध नहीं था. श्री पाटिल के सामने ही इस बच्चों ने पुलिस की असलियत उजागर कर दी. इससे पहले श्री पाटिल ने दादर स्टेशन के पैदल उपरी पुल पर जीआरपी की मेहरबानी से वर्षों से काबिज अवैध फेरीवालों को भी स्थाई रूप से हटाने का निर्देश मुंबई रेल पुलिस आयुक्त को मोबाइल पर वहीं खड़े रहकर दिया. यही नहीं, श्री पाटिल ने वह काम किया जो मंडल रेल प्रशासन ने नहीं किया था, उन्होंने घटना स्थल को अपने सामने पूरी तरह से सील करवा दिया. रेल परिसरों में इस तरह की तमाम अवैध गतिविधियों को रोकने और यात्रियों को इससे होने वाली परेशानी के सम्बन्ध में रेलवे बोर्ड को पत्र लिखने की बात भी श्री पाटिल ने इस मौके पर कही. 

राज्य के गृहमंत्री श्री पाटिल की इस त्वरित कार्रवाई और पत्रकारों को लेकर तुरंत घटना स्थल के निरीक्षण से एक गहरा सन्देश पुलिस और अपराधिक तत्वों को गया है, कि पत्रकारों पर किसी प्रकार के हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएँगे. यही बात श्री पाटिल ने सार्वजनिक रूप से भी कही है. इंस्टीट्यूट की दीवार से लगकर यह कैंटीन इंस्टीट्यूट की प्रबंध समिति (मैनेजिंग कमेटी) में शामिल सदस्यों की मिलीभगत अथवा सहमति के बिना नहीं बनाई जा सकती थी. इस इंस्टीट्यूट का प्रबंधन पहले एक मान्यता प्राप्त संगठन के पास था. उससे जितना बन पड़ा उसने इस इंस्टीट्यूट को बरबाद किया. फिर कुछ समय तक इसका प्रबंधन एक गैरमान्यता प्राप्त संगठन के हाथों में चला गया, उसने इसके फर्नीचर - पंखे भी बेच खाए. जब यह इंस्टीट्यूट पूरी तरह बरबाद हो गया, तब करीब तीन साल पहले रेल प्रशासन ने दोनों मान्यताप्राप्त संगठनों के पदाधिकारियों को लेकर इसके प्रबंधन के लिए एक तदर्थ (एडहाक) समिति बना दी थी. इस समिति में एक कल्याण निरीक्षक भी था. फ़िलहाल यही तदर्थ समिति इसकी देखभाल के बहाने यहाँ अवैध कैंटीन, गैरकानूनी शराब का अड्डा और जुआघर चलवा रही थी. इंस्टीट्यूट में बाहरी लोगों को भी सदस्य बनाया गया है. यह भी एक तथ्य है, जो कि नियम के खिलाफ है. जबकि यह वह रेलवे इंस्टीट्यूट है जहाँ कभी प्रकाश पादुकोण और इक़बाल मेंदर्गी जैसे विश्व स्तरीय खिलाड़ी खेले हैं. यहाँ कभी टेबल टेनिस, बिलियर्ड और बैडमिन्टन खेलने की बेहतरीन व्यवस्था हुआ करती थी. यहाँ एक बहुत ही अच्छी लाइब्रेरी भी हुआ करती थी. इस सबको क्रमशः प्रबंधन समिति में शामिल रहे लोग बेचकर खा गए और कर्मचारियों का वेलफेयर (कल्याण) हो गया. 

यही स्थिति रेलवे के लगभग सभी इंस्टीट्यूट की है. इन सभी रेलवे इंस्टीट्यूट की इस बर्बादी और इनमें चल रहे कदाचार और व्यभिचार के लिए इनकी प्रबंधन समितियों के साथ ही बीसों साल से ओएस/वेलफेयर की सीट पर बैठा कर्मचारी और सम्बंधित अधिकारी भी जिम्मेदार हैं. इन तमाम रेलवे इंस्टीट्यूटस को बाहरी शादियों एवं अन्य सामाजिक कार्यक्रमों के लिए लाखों रुपये के भाड़े पर देकर इन्हें अवैध कमाई का अड्डा बना दिया गया है. इस तमाम अवैध कमाई का कोई हिसाब नहीं है. जो लोग इससे जुड़े हैं वह कुछ ही सालों में करोड़पति हो गए हैं और रेलवे विजिलेंस तथा अन्य भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसियां चुपचाप यह सारा अवैध कारोबार अपनी नाक के नीचे होता देख रही हैं. मगर इस सब में शामिल स्थानीय माफिया की दहशत के कारण न तो कोई कर्मचारी इसकी शिकायत करने की हिम्मत कर पाता है, और न ही कोई एजेंसी इस सब अवैध कारोबार की जांच करने का साहस जुटा पाती है. आखिर यह हो क्या रहा है और किसकी सहमति से हो रहा है और कब तक होता रहेगा? इन तमाम सवालों के बारे में आखिर रेल प्रशासन कब चेतेगा? दादर, भायखला और परेल वर्कशाप के रेलवे इंस्टीट्यूट और बाहरी ग्राउंड भारी अवैध कमाई के अड्डे बने हुए हैं. इसके अलावा विजिलेंस की एडवाइस के बावजूद जब मंडल रेल प्रशासन दादर स्टेशन के डिकाय चेक में पकडे गए कुछ कर्मचारियों को वहां से नहीं हटा पाता है, तो बाकी वह क्या कर सकता है, इसका अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है. 

अब जहाँ तक बात जीआरपी की है, तो उक्त इंस्टीट्यूट उसके दायरे में आता है, सिटी पुलिस का दायरा वहां नहीं हो सकता, क्योंकि उक्त परिसर मध्य एवं पश्चिम रेलवे के बीच स्थित है. जूरिसडिक्शन (परिक्षेत्र) का बहाना बनाकर वह अगर अपना पल्ला झाड़ रही है, तो वह अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है. जहाँ तक बात आरपीएफ की है, तो उसे उसकी जिम्मेदारी से कतई मुक्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि जहाँ तक रेलवे की संपत्ति है, जहाँ तक रेलवे का परिक्षेत्र है, वहां तक आरपीएफ का कार्यक्षेत्र है. आरपीएफ अधिकारी यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते हैं कि वहां उनका कोई काम नहीं था, वहां काफी अपराधी प्रवृत्ति के लोगों का आना-जाना था और वहां यूनियन वालों का इन्वाल्वमेंट है. वह यूनियन के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं. उनके पास मैन पावर की कमी है... यह सब रेल प्रशासन का सिरदर्द है, इससे आम आदमी को कोई मतलब नहीं है और न ही उसे यह सब बताकर उसकी सहानुभूति बटोरी जा सकती है. हाँ, उसे यह सब बताकर अपनी हंसी अवश्य उड़वा सकते हैं. अगर उक्त इंस्टीट्यूट में अवैध कैंटीन, अवैध खानपान व्यवस्था, अवैध जुआघर, शराब का अवैध अड्डा, यदि यह सब नहीं चल रहा था तो वहां 30-35 टेबल-कुर्सियां क्यों लगी थीं?, आदि तमाम गैरकानूनी गतिविधियाँ चल रही थीं, तो आरपीएफ की दादर और मुख्यालय स्थित सीआईबी यूनिटें क्या कर रही थीं? उसकी आईवीजी टीम कहाँ अपनी 'सतर्कता' का प्रदर्शन कर रही थी? क्या सीआईबी यूनिटों और आईवीजी टीमों का यह दायित्व नहीं है कि वे रेल परिसरों में होने वाली तमाम वैध-अवैध गतिविधियों पर नजर रखें? जबकि वास्तव में यही उनका दायित्व है. 

यूनियनों का कार्यक्षेत्र कर्मचारियों का कल्याण और उनकी सेवा-शर्तों की रखवाली करना है, न कि रेल संपत्ति का अवैध इस्तेमाल करना या करवाना. यदि वह ऐसा कर या करवा रही हैं, तो आरपीएफ उन्हें ऐसा करने से निश्चित रूप से रोक सकती है, क्योंकि आरपीएफ का कार्यक्षेत्र तो पहले से ही सम्पूर्ण रेल परिसर में फैला हुआ है, और इस परिसर में होने वाली ऐसी किसी भी अवैध गतिविधि को रोकना अथवा रेल संपत्ति का दुरुपयोग होने से बचाना ही आरपीएफ का प्रथम दायित्व है. आरपीएफ को अपने इस दायित्व को निभाने में उसके आड़े कोई भी रेल कर्मचारी या अधिकारी अथवा यूनियन नहीं आ सकती है. फिर इस सबका बहाना क्यों बनाकर अपने संवैधानिक दायित्व से बचना चाहते हैं आरपीएफ के अधिकारी...?? हमारा यह मानना है कि भारतीय रेल में तथाकथित सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के नाम पर चली आ रही इस एंग्लो-इंडियन इंस्टीट्यूट परंपरा को अब पूरी तरह समाप्त कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह स्थान अपने घोषित उद्देश्य से पूरी तरह भटक चुके हैं. दादर में उक्त इंस्टीट्यूट को ढहाकर उसकी जगह एक बड़ा यात्री विश्रामालय बनाया जाना चाहिए, जिससे रेलवे को रोजाना भारी आमदनी होगी, क्योंकि दादर के आसपास कोई मामूली सा होटल भी सस्ता नहीं है, और दोनों रेलों के यात्रियों को यहाँ भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है. इससे रेलवे के कुछ असामाजिक तत्वों के बजाय रेलवे की कमाई होगी और अवैध एवं गैरकानूनी गतिविधियों को भी हमेशा के लिए समाप्त किया जा सकेगा. यही व्यवस्था हर रेलवे इंस्टीट्यूट के लिए लागू की जानी चाहिए. 
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Thursday 12 April 2012

सेवानिवृत्ति के बाद पदाधिकारी बने रहने का कोई सवाल ही नहीं है - जे. पी. सिंह

मुंबई : सेवानिवृत्ति के बाद इंडियन रेलवे प्रमोटी आफिसर्स फेडरेशन (आईआरपीओएफ) का पदाधिकारी बने रहने अथवा सेवानिवृत्त अधिकारियों को पदाधिकारी बनाए जाने का एक शगूफा छोड़ा गया है. जिससे आजकल भारतीय रेल के तमाम प्रमोटी अधिकारियों में एक प्रकार की खिन्नता देखी जा रही है और इस शगूफे पर वह अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं. उनका कहना है कि पिछले पांच - छह सालों के दौरान एक पदाधिकारी के कारण वैसे ही फेडरेशन की सारी गरिमा मिट्टी में मिल गई है, और लगभग हर जोन में गंदी राजनीति फ़ैल गई है तथा फेडरेशन की अधिकतर कार्रवाई झूठ पर आधारित हो गई है. ऐसे में अगर वर्तमान महासचिव जैसे झूठों के सरताज पदाधिकारी को सेवानिवृत्ति के बाद भी पदाधिकारी बनाए रखा गया, तो फेडरेशन की बची-खुची अस्मिता भी धूल में मिल जाएगी. इस मुद्दे पर 'रेलवे समाचार' द्वारा जब यह पूछा गया कि क्या ऐसा कोई विचार फेडरेशन में चल रहा है, तो आईआरपीओएफ के अध्यक्ष श्री जे. पी. सिंह ने इसका सिरे से खंडन करते हुए कहा कि ऐसा कोई विचार नहीं चल रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद पदाधिकारी बने रहने या सेवानिवृत्त अधिकारी को पदाधिकारी बनाए जाने का कोई सवाल ही नहीं है. सबसे पहले वे स्वयं इस विचार के विरोधी हैं. 

श्री जे. पी. सिंह ने आगे बताया कि इलाहबाद में 15 - 16 मार्च को हुई ईसीएम की दूसरे दिन की बैठक समाप्त होने के बाद एक सदस्य ने इस पर अवश्य कुछ विचार व्यक्त किया था. उन्होंने कहा कि उसका यह विचार बैठक का हिस्सा नहीं था. तथापि उक्त सदस्य के यह विचार व्यक्त करते ही उस पर वहां उपस्थित सभी अधिकारियों ने तुरंत इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया था. उसके बाद यह बात वहीं ख़त्म हो गई थी. श्री सिंह का कहना था कि कुछ लोग हैं जो बात का बतंगड़ बनाते रहते हैं. उन्होंने आगे यह भी कहा कि इस मुद्दे पर कोई भी अधिकारी सहमत नहीं होगा और सबसे पहले वह खुद इस तरह के किसी विचार या प्रस्ताव का समर्थन नहीं करेंगे.  उन्होंने बताया कि सबसे लम्बे समय तक निर्विरोध निर्वाचित होते रहे पूर्व महासचिव श्री के. हसन को सेवानिवृत्ति के बाद फेडरेशन का महासचिव बनाए रखने पर सहमति नहीं हो पाई थी, जबकि तत्कालीन रेलमंत्री उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद महासचिव पद पर बने रहने की मंजूरी देने को तैयार थे, मगर प्रमोटी अधिकारी इसके लिए सहमत नहीं हुए थे और तब गोरखपुर में हुई फेडरेशन की सर्वसाधारण सभा में इसका प्रस्ताव गिर गया था. 

बहरहाल, श्री जे. पी. सिंह की इस स्पष्टोक्ति के बाद अब यह विचार यहीं ख़त्म हो जाना चाहिए. वैसे भी सभी प्रमोटी अधिकारी श्री सिंह का उनकी आदर्शवादिता और ईमानदारी के लिए बहुत सम्मान करते हैं. तमाम प्रमोटी आफिसर निर्विवाद रूप से यह मानते हैं कि फेडरेशन में उनके रहने की वजह से ही वे महासचिव के झूठ, गलतबयानी और गंदी राजनीति के साथ ही उनके तमाम संदिग्ध कार्य-व्यवहार का खुलकर विरोध नहीं कर पाते हैं. उनके मन में फेडरेशन के अध्यक्ष श्री जे. पी. सिंह के प्रति गहरे सम्मान की भावना है, क्योंकि वह कभी झूठ नहीं बोलते हैं, और न ही कभी किसी को दिग्भ्रमित करने वाला कोई बयान जारी करते हैं. उनको कोई निर्णय लेने में भी देर नहीं लगती है. वह अनावश्यक कभी किसी विवाद में भी नहीं पड़ते हैं, और न ही कभी कोई विवाद पैदा करते हैं. उनका कहना है कि श्री सिंह अपने ईमानदार आचरण एवं पारदर्शी कार्य-व्यवहार के कारण ही रेलवे बोर्ड की बैठकों में रेलों में व्याप्त भ्रष्टाचार तथा कार्यालयीन कामकाज में अनियमितता पर निर्भय होकर अपना बेबाक बयान देने में सक्षम होते हैं. जो कि बहुत कम पदाधिकारियों और अधिकारियों में देखा जाता है. 

तथापि श्री सिंह के प्रति उपरोक्त अपनी तमाम सदभावना के बावजूद लगभग सभी जोनो के जोनल पदाधिकारियों और प्रमोटी अधिकारियों की उनसे यह अपेक्षा है कि वे फेडरेशन की अगली सर्वसाधारण सभा नियत समय पर जुलाई में ही करवाने की व्हिप जारी करें. क्योंकि हर साल जनवरी - फरवरी में होने वाली यह सर्वसाधारण सभा (एजीएम) खिसकते - खिसकते अब जुलाई में पहुँच गई है. और अब इसे इस साल जुलाई से भी छह महीने आगे खिसकाकर दिसंबर में करवाने की तैयारी की जा रही है, जो कि अनैतिक है. उनका मानना है कि यदि श्री सिंह चाहें तो यह एजीएम भी अपने नियत समय पर हो सकती है. इस मुद्दे पर भी 'रेलवे समाचार' ने श्री जे. पी. सिंह से उनका विचार जानना चाहा, इस पर श्री सिंह का कहना था कि वह आज ही पद छोड़ने को तैयार हैं, बशर्ते कि कोई आगे आए और जिम्मेदारी संभाल ले. श्री सिंह का आगे कहना था कि यदि कोई पदाधिकारी सेवानिवृत्त हो रहा है और वह चाहता है कि उसकी सेवानिवृत्ति के आस-पास फेडरेशन की भी बैठक रख ली जाए, तो इसमें उन्हें कोई खास बुराई नजर नहीं आती है, तथापि उनका निजी तौर पर यह मानना है कि एजीएम अपने नियत समय पर ही होनी चाहिए और ऐसा करने के लिए जल्दी ही वह अपने पदाधिकारियों से बात करेंगे. 
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Friday 6 April 2012

हाई कोर्ट को संयम बरतने की जरूरत..!

 हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान मुंबई हाई कोर्ट ने रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स (आरपीएफ) के सम्बन्ध में "रेलवे डिसत्रक्तिव फ़ोर्स" (Railway Distructive Force) जैसी एक भ्रामक टिप्पणी की है, जिससे करीब 70 हजार जवानों की यह फ़ोर्स काफी उद्वेलित है. उनमें और उनके प्रशासनिक अधिकारियों में इस टिप्पणी पर हाई कोर्ट के प्रति न सिर्फ काफी आक्रोश व्याप्त हुआ है, बल्कि वह इससे काफी हतोत्साहित और अपमानित भी महसूस कर रहे हैं. हाई कोर्ट की इस टिप्पणी से जहाँ एक ओर इस मामले में लिप्त रहे लोग यह सोचकर खुश हो रहे हैं कि सिर्फ वही ऐसे नहीं हैं, बल्कि सभी उन्हीं की तरह हैं, क्योंकि उक्त टिप्पणी सभी के बारे में की गई है. इससे मामले में लिप्त रहे लोगों का नहीं, बल्कि पूरी फ़ोर्स का सिर नीचा हुआ है. यदि हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से अपनी यह टिप्पणी सिर्फ मामले में लिप्त रहे लोगों तक सीमित की होती, तो सिर्फ वही लोग हतोत्साहित हुए होते और दूसरों के सामने उनका ही सिर नीचा हुआ होता. बाकी लोगों को अपमानित महसूस नहीं करना पड़ता. तथापि उद्वेलित और हतोत्साहित आरपीएफ जवानों को आरपीएफ एसोसिएशन के प्रबुद्ध नेतृत्व ने यह कहकर समझाया कि हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी पूरी फ़ोर्स के सन्दर्भ में नहीं, बल्कि मामले से सम्बंधित उन कुछ लोगों के खिलाफ की है, जो मामले में कहीं न कहीं लिप्त रहे हैं, तब जाकर आरपीएफ के जवान शांत हुए और उनको कुछ राहत महसूस हुई है..  

मुंबई हाई कोर्ट ने उक्त टिप्पणी कुर्ला स्टेशन पर फर्जी बेल बांड (जमानत पत्र) कांड पर दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान की है. हाई कोर्ट द्वारा की गई यह टिप्पणी निश्चित रूप से न सिर्फ भ्रामक है, बल्कि जनसामान्य में इससे एक गलत सन्देश भी जाएगा. हालाँकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट और कुछ अन्य हाई कोर्टों ने भी पुलिस आदि के बारे में ऐसी टिप्पणियां की हैं. मगर यहाँ यह कहना गलत नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और तमाम जूडीसियरी को ऐसे संवेदनशील मामलों में थोड़ा संयम बरतने की जरूरत है. इस तरह की टिप्पणियां पूरी फ़ोर्स अथवा पूरे समाज के सन्दर्भ में नहीं, बल्कि यदि अत्यंत आवश्यक ही हो तो, सिर्फ मामले से सम्बंधित लोगों के ही बारे में की जानी चाहिए, क्योंकि किसी गलत काम अथवा गैरकानूनी कृत्य के लिए पूरी फ़ोर्स या पूरा समाज दोषी नहीं हो सकता. 

प्रस्तुत मामले में एक एनजीओ द्वारा दायर की गई याचिका पर संज्ञान लेते हुए मुंबई हाई कोर्ट ने स्वयं इस याचिका को जनहित याचिका में तब्दील किया है. परन्तु इस याचिका में उक्त एनजीओ द्वारा इस मामले से सम्बंधित तमाम वास्तविक तथ्य कोर्ट के सामने नहीं रखे गए हैं. जैसे कि इस तरह का भ्रष्टाचार अथवा गैरकानूनी कार्य किसी उच्च अधिकारी के संरक्षण के बिना नहीं हो सकता था. और प्रस्तुत मामले में यह उच्च अधिकारी था मध्य रेलवे आरपीएफ का तत्कालीन प्रमुख यानि आईजी/सीएससी/आरपीएफ/म.रे.. एनजीओ ने अपनी इस याचिका में उसे आरोपी नहीं बनाया है, जबकि उस समय म. रे. आरपीएफ में ऐसे तमाम भ्रष्टाचार और गैरकानूनी कृत्यों का प्रमुख सूत्रधार वही था, जो कि आज पदोन्नति लेकर उत्तर के एक राज्य की पुलिस का अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक बनकर बैठा हुआ है. वर्ष 2007 में हमने जब विभिन्न आरपीएफ पोस्टों से उगाही जाने वाली अवैध राशि के तमाम आंकड़े "परिपूर्ण रेलवे समाचार" में प्रकाशित किए थे, बाद में सीबीआई ने भी अपनी गहन कार्रवाई में इन तथ्यों को साबित किया है, तब इसी आईजी के इशारे पर 35 आरपीएफ इंस्पेक्टरों ने न सिर्फ क़ानूनी नोटिस भेजे थे, बल्कि इसी आईजी के दबाव में उनमे से 16 इंस्पेक्टरों ने 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' के खिलाफ महाराष्ट्र की विभिन्न अदालतों में आरपीएफ फ़ोर्स की मानहानि करने के मामले भी दाखिल किए थे. जिनमे से कुछ अब तक चल रहे हैं और कुछ मामलों को निराधार बताकर सम्बंधित अदालतों द्वारा ख़ारिज किया जा चुका है. 

कहने का तात्पर्य यह है कि बिना उच्च अधिकारियों की शह या संरक्षण के निचले स्तर पर इस तरह का कोई भ्रष्टाचार पनप नहीं सकता, क्योंकि भ्रष्टाचार पानी की ऊपर से नीचे की तरफ बहता है. अदालतों के पास पर्याप्त अधिकार हैं कि वे मामले की तह तक जाएँ, और भ्रष्टाचार के समस्त मामलों में उच्च अधिकारियों की भूमिका और जिम्मदारी को रेखांकित करें, क्योंकि बिना ऐसा किए उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टचार को रोका नहीं जा सकेगा. निचले स्तर पर इसकी जिम्मेदारी तय करके और सजा देकर समाज और प्रशासन में फैले इस 'कोढ़' को जड़ - मूल से नष्ट नहीं किया जा सकता. मीडिया (परिपूर्ण रेलवे समाचार) ने जब ऐसे उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार को उजागर किया, तो उसे गैरजरूरी क़ानूनी मामलों में उलझा दिया गया. उक्त एनजीओ ने भी शायद इसी वजह से तत्कालीन आईजी/सीएससी/आरपीएफ/म.रे. को अपनी इस याचिका में आरोपी नहीं बनाया है, क्योंकि यदि वह ऐसा करता, तो उसे भी मीडिया (परिपूर्ण रेलवे समाचार) की ही तरह विभिन्न क़ानूनी मामलों में उलझाया जा सकता था. यहाँ यह भी ध्यान देने वाली बात है कि कुर्ला स्टेशन पर चल रहे इस गैरकानूनी और फर्जी बेल बांड कांड को उक्त एनजीओ ने नहीं, बल्कि आरपीएफ के ही कुछ जवानों और आरपीएफ एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने ही उजागर किया था, जिसके लिए गलत तरीके से इन जवानों और पदाधिकारियों को तत्कालीन आईजी द्वारा पहले अन्यत्र ट्रांसफ़र किया गया और बाद में नौकरी से भी बर्खास्त किया गया था. उक्त आईजी के लगभग जबरन रिपैट्रीएशन के बाद ही सम्बंधित एनजीओ ने इस मामले में अदालती कार्रवाई शुरू की थी. ऐसे में पूरी आरपीएफ फ़ोर्स को डिसत्रक्तिव फ़ोर्स कहना सही नहीं है. 

तत्कालीन आईजी/सीएससी/आरपीएफ/म.रे. के समय ही उसकी नाक के नीचे छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (सीएसटी) पर 26/11 का सबसे पहला और बड़ा आतंकवादी हमला हुआ था, जिसमे सर्वाधिक लोग मौत के घाट उतारे गए थे, मगर यह आईजी बधवार पार्क स्थित अपने घर के बाहर चार कमांडोज को तैनात करके मीठी नींद सो रहा था. यदि वह इन चारो कमांडोज को तुरंत सीएसटी भेज देता, तो यह सीएसटी पर हमलावर मात्र दो आतंकवादियों को मिनटों में मार गिरा सकते थे. किसी अदालत ने उक्त आईजी की ड्यूटी के प्रति इस घोर लापरवाही और गैरजिम्मेदारी का संज्ञान नहीं लिया. उक्त आईजी के खिलाफ भ्रष्टाचार के तमाम आरोप साबित हुए, और चार्जशीट भी देने की तैयारी हो गई, मगर तत्कालीन डीजी/आरपीएफ ने उसे सिर्फ रिपैत्रियेत (repatriate) करके मामले को रफा - दफा कर दिया. 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' ने इन तमाम तथ्यों को उजागर किया था. 

राज्य सरकार द्वारा गठित की गई राम प्रधान कमेटी ने पूरे मुंबई शहर में अब तक के इन सबसे भयानक आतंकवादी हमलों की जांच की थी, मगर राम प्रधान कमेटी ने सीएसटी, जहाँ सबसे ज्यादा लोग आतंकवादियों की बर्बर गोलियों का शिकार हुए थे, जाकर यह देखने की भी जरूरत नहीं महसूस की थी कि मुंबई महानगर में हुआ सबसे पहला और सबसे बड़ा आतंकवादी हमला कहाँ और कैसे हुआ था? राम प्रधान कमेटी ने रेलवे परिसर (सीएसटी) को केंद्र का क्षेत्र मानकर वहां जाना जरूरी नहीं समझा, जबकि वह स्थान भी राज्य के दायरे में है और मारे गए लोग भी राज्य के ही नागरिक / रहिवासी थे. कानून - व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार राज्य अपने दायरे में होने का दावा करते हैं, तथापि किसी कोर्ट ने इस पर कोई संज्ञान नहीं लिया? 

यह माना जा सकता है कि हाई कोर्ट की उक्त टिप्पणी के पीछे उसकी मंशा जरूर वैसी ही रही होगी, जैसी कि आरपीएफ एसोसिएशन के परिपक्व नेतृत्व ने उद्वेलित आरपीएफ जवानों को समझाकर शांत किया. हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को भी अपनी टिप्पणियों में इतनी ही स्पष्टता बरतनी चाहिए. वरना उनकी देखा - देखी निचली अदालतें भी इस प्रकार का गैरजिम्मेदाराना आचरण कर सकती हैं. विगत में यह देखने में आया है कि जूडीसियरी भी कदाचार से मुक्त नहीं है. यहाँ तक कि उच्च जूडीसियरी पर भी इस तरह के आरोप लगते रहे हैं. और आज भी भारत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ इसी प्रकार के कदाचार की जांच चल रही है. जबकि इससे पहले कुछ न्यायाधीशों के खिलाफ संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाया जा चुका है. इनमे से कुछ ने इस प्रकार के प्रस्ताव पर बहस से पहले अपना इस्तीफा देकर संसद और जूडीसियरी की गरिमा को बचाया, तो कुछ ने उसे तार-तार भी किया है. परन्तु इसका मतलब यह कतई नहीं हो सकता कि देश की पूरी जूडीसियरी ही भ्रष्ट या कदाचारी है. 

इसी प्रकार राज्यों की पुलिस का हर पुलिसवाला भ्रष्ट या कदाचारी नहीं है, कुछ पुलिसवाले ऐसे अवश्य हो सकते हैं, मगर उन कुछ पुलिसवालों के कदाचार या भ्रष्टाचार अथवा गलत आचरण के लिए पूरी पुलिस फ़ोर्स को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. कभी जस्टिस श्रीकृष्ण अय्यर ने टिप्पणी की थी कि खाकी वर्दी में पुलिस वाले डकैत हैं, तो क्या माननीय पूर्व न्यायाधीश की इस टिप्पणी से सभी पुलिस वाले सदाचारी हो गए ? ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि इसका कारण यह है कि पुलिस के उच्चाधिकारियों का ऐसी टिप्पणियों से कुछ नहीं बनता - बिगड़ता. जबकि सारा दुराचार उनके कहने या इशारे पर ही होता है. 

आरपीएफ के सन्दर्भ में यहाँ यह जान लेना जरूरी है कि यह देश कि सर्वसामान्य जनता के सर्वाधिक संपर्क में आने वाली फ़ोर्स है और ट्रेनों में चलने वाले प्रतिदिन दो - सवा दो करोड़ यात्रियों के संपर्क में आने से मात्र दो महीनो में यह देश की सवा सौ करोड़ आबादी के संपर्क में आ जाती है. देश की ऐसी अन्य कोई फ़ोर्स नहीं है जो इस कदर जनसामान्य के सीधे संपर्क में आती हो. ऐसे में यात्रियों की सुरक्षा में रात - दिन चलती गाड़ियों में लगे रहने वाले आरपीएफ जवानों को तब गुस्सा आ सकता है अथवा यात्रियों और आरपीएफ कर्मियों के बीच मारामारी या गोलीबारी की नौबत भी आ सकती है, जब कोई यात्री या यात्रियों का समूह आरपीएफ जवानों को हाई कोर्ट की उक्त टिप्पणी का हवाला देते हुए चिढ़ा रहा होगा.. जहाँ तक सेना का सन्दर्भ है, जिसके बारे में आजकल बहुत कुछ दुष्प्रचार हो रहा है. वह चाहे सेनाध्यक्ष की अति-महत्वाकांक्षा या उनकी निहित्स्वार्थपरता हो, अथवा हथियार आपूर्ति लाबी के कारण हो, मगर गलत कारणों से आजकल सेना और सेनाध्यक्ष दोनों चर्चा में हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि वह भ्रष्ट हैं या पूरी सेना और पुलिस कदाचारी हो गई है, यदि ऐसा हो गया, तो देश की सुरक्षा और तमाम प्रशासन ही चौपट हो जाएगा तथा पूरा लोकतंत्र ही खतरे में पड़ जाएगा. 

किसी समाज का कोई एक व्यक्ति कदाचारी, भ्रष्ट या हत्यारा - बलात्कारी हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं हो सकता कि वह पूरा समाज ही ऐसा है, जिसके लिए उस पूरे समाज के खिलाफ कोई गलत टिप्पणी की जाए या उसे दोषी ठहराया जाए. मीडिया में भी बहुत से गलत या भ्रष्ट लोग हो सकते हैं, और हैं भी, मगर यह कहा जाए कि पूरा मीडिया ही भ्रष्ट हो गया है, तो यह कतई उचित नहीं होगा. यही विवाद आजकल माननीय सांसदों को लेकर भी पूरे देश में चल रहा है, इसका मतलब यह नहीं है कि राजनीति में सारे लोग ही ख़राब या भ्रष्ट हैं.. यदि ऐसा होता, तो क्या यह संसदीय लोकतंत्र इन 66 सालों तक भी टिका रह पाता? मगर 'अति सर्वत्र वर्जयेत' की तर्ज पर यह जरूर कहा जा सकता है कि अब लोकतंत्र के इन चारों स्तंभों के गरिमामय आचरण में काफी गिरावट आ गई है, और समय रहते अगर इन चारों स्तंभों ने अपनी - अपनी गरिमा को पुनर्स्थापित नहीं किया, तो वह दिन भी दूर नहीं है, जब यह तमाम व्यवस्था इनके अपने ही आचरण से डगमगाने लगेगी. 
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Thursday 5 April 2012


एआईआरएफ द्वारा संसद का घेराव 


रेलवे का राजनीतिक शोषण बंद किया जाए -शिवगोपाल मिश्रा 

नई दिल्ली : आल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन (एआईआरएफ) के नेतृत्व में 28 मार्च को करीब 20 हजार से ज्यादा रेलकर्मियों ने रेल किराया वापस लिए जाने के विरोध में संसद का घेराव किया. इस अवसर पर एआईआरएफ के महामंत्री कामरेड शिव गोपाल मिश्रा ने कहा कि अगर केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के दबाव में बढे हुए रेल किरायों को वापस लिया है तो उनकी भरपाई अब केंद्र सरकार को जनरल बजट से करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि रेलवे में खाली पड़े लाखों पदों के कारण रेलकर्मियों पर काम का भारी बोझ है. उनके अनुसार रेलवे में करीब ढाई लाख पद खाली हैं, जिनमे से लगभग डेढ़ लाख पद सिर्फ संरक्षा कोटि के हैं. इन पदों के नहीं भरे जाने से ट्रेनों का संचालन असुरक्षित होता जा रहा है. 

कामरेड मिश्रा ने कहा कि संसद के घेराव में 20 हजार से ज्यादा रेलकर्मियों ने हिस्सा लिया, इसका मतलब है कि कर्मचारियों में सरकार के प्रति आक्रोश बढ़ता जा रहा है. उन्होंने कहा कि हर साल बजट में नई ट्रेनों की घोषणा के साथ ही पुरानी ट्रेनों के फेरे बढ़ा दिए जाते हैं, लेकिन इसके अनुरूप कर्मचारियों की तैनाती नहीं की जाती है. उन्होंने कहा कि देश भर में खाली पड़े ढाई लाख पदों के कारण रेलकर्मियों पर काम का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है. अत्यधिक काम के दबाव में तमाम कर्मचारी बीमार हो रहे हैं. इसलिए वह स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के आवेदन दे रहे हैं. 

उन्होंने कहा कि लोको पायलट, सहायक स्टेशन मास्टर, पॉइंट्समैन, ट्रैकमैन, तकनीशियन, सिग्नलिंग स्टाफ, टिकट चेकिंग स्टाफ, आरक्षण स्टाफ और वरिष्ठ खंड अभियंताओं के लाखों पद वर्षों से खाली चल रहे हैं, सरकार इन सब पदों को भरने में लगातार टालमटोल कर रही है. उन्होंने कहा कि पिछले 15 वर्षों में रेल बजट में घोषित की गई हजारों रेल परियोजनाओं पर काम नहीं हो पा रहा है, तथापि हर साल फिर कई - कई योजनाएं घोषित कर दी जाती हैं. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि रेलवे का राजनीतिक शोषण तुरंत बंद किया जाना चाहिए. 

उन्होंने मांग की है कि रेलों के विकास के लिए आम बजट से समुचित फंड का आवंटन किया जाना चाहिए. सीनियर सुपरवाइजरों को 4800 का ग्रेड पे और ग्रुप 'बी' की पदोन्नति दी जानी चाहिए. तकनीशियन ग्रेड-2 को ग्रेड-1 का 2800 ग्रेड पे तुरंत स्वीकृत किया जाए. रनिंग कर्मचारियों के ग्रेड पे में सुधार तथा दि. 01.01.2006 से रनिंग एलाउंस के एरियर का भुगतान एवं माइलेज/एएलके की दरों में वृद्धि की जाए. नई पेंशन स्कीम और पीएफ/आरडीए बिल को वापस लेकर पुरानी पेंशन स्कीम को बहाल किया जाए. एमएसीपी की खामियों को अविलम्ब दूर किया जाना चाहिए. ढाई लाख से ज्यादा खाली पड़े पदों पर रेलकर्मियों के बच्चों/आश्रितों की तुरंत भर्ती की जाए. निजीकरण और आउट सोर्सिंग पर अविलम्ब रोक लगाई जाए. रेलकर्मियो के लिए घोषित कल्याणकारी योजनाओं को लागू किया जाए और रेलवे कालोनियों की हालत में सुधार किया जाए. एलएआरएसजीईएसएस का सरलीकरण करके इसे सभी कोटि के रेलकर्मियो के लिए लागू किया जाए. ट्रैकमैन पैकेज कमेटी की सिफारिशों पर तुरंत अमल किया जाए. संरक्षा कोटि के कर्मियों के लिए अधिकतम 8 घंटे कार्य की सीमा तय की जाए.