Saturday, 8 August 2009

कर्मचारियों को नहीं मिल रहे सुविधा पास

झांसी : वैगन रिपेयर डिपो के कर्मचारियों को पिछले 6 महीनों से एसएसई/सीएंडडब्ल्यू की मनमानी से इयर एंडिंग सुविधा पास नहीं मिल पा रहे हैं, क्योंकि एसएसई/सीएंडडब्ल्यू सीनियर डीपीओ/बोर्ड के भी आदेश मानने को तैयार नहीं हैं. इससे डिपो के तमाम कर्मचारियों को बिना पास के यात्रा करनी पड़ रही है, जबकि इस बारे में एसई/टीएन. वैगन रिपेयर डिपो द्वारा बार-बार सीनियर डीपीओ/झांसी को रे.बो. और उनके पत्रों (सं. ई.(डब्ल्यू)92/पी/55-1/05, दि. 09.12.93, डीआरएम/पी/झांसी पत्र सं. पी-305/ओईजी/पॉलिसी दि. 9.3.94, पत्र सं. पी-305/17/05/आरटीआई/ईपी. दि. 21.1.09) का हवाला देते हुए सूचित (पत्र सं. एनसी/8/झांसी/2009, दि. 24-26.01.09) किया गया, तथापि अब तक यहां के कर्मचारी रूटीन सुविधा पास से वंचित हैं, जिससे टिकट चेकिंग स्टाफ द्वारा उन्हें यात्रा के समय परेशान किया जा रहा है.

उल्लेखनीय है कि एसई/सी एंड डब्ल्यू, वैगन रिपेयर डिपो झांसी द्वारा 24-26.01.09 के पत्र में अपने दि. 10.01.09 एवं 15.1.09 के सीनियर डीपीओ को लिखे गए समसंख्यक पत्र में यह भी लिखा गया है कि बोर्ड एवं डीआरएम/पी के उपरोक्त पत्रों का संदर्भ देने पर एसएसई/सीएंडडब्ल्यू (प्रशासनिक) झांसी ने यह कह कर पास देने से मना कर दिया कि वर्ष 2008 के इयर एंडिंग सुविधा पास के आदेश में नये वर्ष 2009 के लिए आदेश नहीं है. पत्र में लिखा गया है कि जब पुन: 23.01.09 को समसंख्यक पत्र के साथ कुछ कर्मचारी पास लेने पहुंचे तो भी उन्होंने उन्हें लेने से मना कर दिया और कहा कि इस बारे में सीनियर डीपीओ को कह दिया गया है, तो जब तक इसके नये आदेश जारी नहीं होते, तो तुम लोग यहां बार-बार क्या लेने चले आते हो, कृपया मुझे बख्शो, जब डीआरएस/पी फ्रेश पत्र वर्ष 2009 में जारी करेंगे, तब देखा जाएगा. इसके अलावा उक्त पत्र कई बार डीआरएम/एडीआरएम को भी लिखे गए हैं परंतु चालू वर्ष के करीब 7 महीने बीत रहे हैं, मगर कर्मचारियों की इस समस्या पर न तो किसी अधिकारी ने ध्यान दिया और न ही एसएसई/सी एंड डब्ल्यू की अड़ीबाजी या मनमानी में कोई फर्क आया है. परिणामस्वरूप कर्मचारी बिना सुविधा पास के ही यात्रा करने के लिए मजबूर हैं.
बोर्ड विजिलेंस से हटाये गए के पी यादव

बड़े बेआबरू होकर निकाले गए तेरे कूचे से...

नयी दिल्ली : पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव के सहायक निजी सचिव (एपीएस) रहे कैलाश प्रसाद यादव उर्फ के.पी. यादव को रेलवे बोर्ड विजिलेंस से बाहर कर दिया गया है. यह जानकारी बोर्ड के हमारे विश्वसनीय सूत्रों ने दी है. सूत्रों ने बताया कि श्री यादव को तुरंत पिछले शुक्रवार को बोर्ड विजिलेंस की डायरेक्टर ट्रैफिक पोस्ट से कार्यमुक्त (रिलीव) करके उत्तर रेलवे में भेज दिया गया है. सूत्रों का यह भी कहना था कि उन्हें दिल्ली से बाहर जम्मू या अन्यत्र किसी दूरस्थ क्षेत्र में पदस्थ करने के मौखिक आदेश बोर्ड द्वारा महाप्रबंधक/उ.रे. को दिए गए हैं.

ज्ञातव्य है कि पूर्व रेलमंत्री का कार्यकाल समाप्त होने से कुछ पहले ही श्री यादव ने विजिलेंस में एक ईमानदार अधिकारी की जगह अपनी पोस्टिंग करवाकर अपने लिए एक सुरक्षित स्थान की तलाश कर ली थी. परंतु बोर्ड के कुछ अधिकारियों का कहना है कि पूर्व रेलमंत्री के साथ रहकर श्री यादव ने कई भ्रष्ट अधिकारियों को उनकी मनचाही पोस्टिंग दिलवाई थी. सूत्रों का कहना है कि इन पोस्टिंग में हुए भ्रष्टाचार और पक्षपात की जानकारी जब मंत्री तक पहुंची तब उन्हें विजिलेंस से हटाने के आदेश दिए गए. सूत्रों ने कहा कि श्री यादव को विजिलेंस से हटाए जाने पर अधिकांश ईमानदार अधिकारियों ने राहत की सांस ली है.


सीएफटीएम/ द.पू.रे. बी. डी. राय
को क्यों नहीं हटाया जा रहा...?


कोलकाता : पूर्व रेलमंत्री के खास चहेते श्री बी. डी. राय, सीएफटीएम/द.पू.रे. को उनके वर्तमान पद से क्यों नहीं हटाया जा रहा है, यह सवाल तमाम आईआरटीएस अधिकारियों को लगातार पिछले 5-6 साल से परेशान कर रहा है. उल्लेखनीय है कि पूर्व रेलमंत्री और पूर्व सीआरबी के खास चहेते श्री. बी. डी. राय पिछले 5-6 वर्षों से द.पू.रे. की सबसे ज्यादा कमाऊ पोस्ट सीएफटीएम पर विराजमान हैं. विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार श्री राय ने रेक एलॉटमेंट का सारा अधिकार अपने पास रखा हुआ है, सूत्रों के अनुसार कुछ खास लोडिंग कंपनियों को अपने खास दलालों की मार्फत लाखों रुपये की एवज में प्राथमिकता को आधार बनाकर और रेलवे बोर्ड के दिशा-निर्देशों का पूरी तरह उल्लंघन करके श्री राय द्वारा रेक एलॉटमेंट किया जा रहा है. ज्ञातव्य है कि रेक एलॉटमेंट का अधिकार रेलवे बोर्ड ने मंडलों के सीनियर डीओएम्स को दिया हुआ है. जबकि सिर्फ पॉलिसी मैटर्स सीएफटीएम के अधिकार क्षेत्र में हैं. परंतु बोर्ड के निर्देशों का खुला उल्लंघन करके श्री राय ने रेक एलॉटमेंट का सीनियर डीओएम का अधिकार स्वयं ले रखा है. सूत्रों का कहना है कि इससे मंडलों के सीनियर डीओएम्स को भारी परेशानी हो रही है क्योंकि लोडरों को सीएफटीएम का वरदहस्त होने से वे उनको जरा भी तवज्जो नहीं देते हैं. सूत्रों का कहना था कि द.पू.रे. में रेक एलॉटमेंट में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है. उन्होंने यहां पिछले 5-6 वर्षों के दरम्यान हुए रेक एलॉटमेंट के संपूर्ण प्रकरण की सीवीसी/सीबीआई से जांच करवाने की मांग की है.

विवेक सहाय ने अंतत: आईआरपीएस
को सीपीआरओ/उ.रे. बनाया


नयी दिल्ली : जैसा कि 'रेलवे समाचार' के पिछले अंक में 'सीपीआरओ/उ.रे की पोस्टिंग में महाप्रबंधक/उ.रे. की रुचि नहीं' शीर्षक के अंतर्गत खबर में बताया गया था कि महाप्रबंधक/उ.रे श्री विवेक सहाय किसी आईआरटीएस अधिकारी को उ.रे का सीपीआरओ नहीं बनाना चाहते हैं, वह खबर सच साबित हुई है. क्योंकि खबर प्रकाशित होते ही उन्होंने आनन फानन अपनी मनमानी करते हुए आईआरपीएस अधिकारी श्री आनंद स्वरूप को उ.रे. का सीपीआरओ बना दिया है. ज्ञातव्य है कि श्री आनंद स्वरूप इससे पहले दिल्ली डिवीजन में सीनियर डीपीओ थे. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि श्री आनंद स्वरूप भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री मुरली मनोहर जोशी के दामाद हैं. इस तरह श्री सहाय ने अगला एमटी बनने के लिए एक और राजनीतिक सपोर्ट हासिल कर लिया है. परंतु 'रेलवे समाचार' की उक्त खबर का असर यह हुआ कि श्री सहाय अपने खास चहेते श्री. एस. एस. नेगी को उक्त पद पर बैठाकर पुरकृत करने से चूक गये हैं. ज्ञातव्य है कि श्री नेगी, उ.म.रे. में श्री सहाय सहित महाप्रबंधक के सचिव के पद पर पिछले 9 साल से लगातार पदस्थ रहे हैं, करीब तीन महीने पहले ही उनका तबादला उ.म.रे. इलाहाबाद से उ.रे. दिल्ली में हुआ है. श्री नेगी आईआरएसईई अधिकारी हैं. इनकी लीन आज भी द.म.रे. में ही है.
जनता का, जनता के लिए, 'ममता' द्वारा
बनाया गया 'ममतामयी' रेल बजट

नयी दिल्ली : शुक्रवार, 3 जुलाई को रेलमंत्री ममता बनर्जी द्वारा संसद में पेश किया गया रेल बजट जहां प. बंगाल उन्मुख है, वहीं वर्ष 2011 के मध्य में वहां होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर ममता द्वारा बनाया गया है. इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस के साथ इसमें कांग्रेस पार्टी की भी सहमति दिखाई दे रही है, जैसा कि बजट से एक दिन पहले ममता ने कहा था कि उनका बजट जनता का बजट और सामान्य बजट होगा. वैसा ही वास्तव में 'जनता का, जनता के लिए ममता द्वारा बनाया गया ममतामयी बजट' है. इसी तरह इसमें सस्ते पास, गुणवत्तापूर्ण भोजन और साफ-सफाई की लोकप्रियता पाने वाली छौंक भी लगी है.

परंतु जब ममता ने इसे संसद में प्रस्तुत किया तो यह प. बंगाल उन्मुख बजट था. जैसा कि बजट से पहले अनुमान लगाया गया था, यह ठीक उसी के अनुरूप सामने आया है. इससे पहले जब एनडीए सरकार के समय ममता ने अपना रेल बजट प्रस्तुत किया था, तब विपक्षी कांग्रेस और अन्य विरोधी दलों ने उनकी खूब आलोचना की थी परंतु इस बार वह चूंकि कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार में शामिल हैं, इसलिए उन्हें ज्यादा विरोध का सामना नहीं करना पड़ा है.

रेलवे के सामने पूंजीगत कठिनाईयां मुंह बाये खड़ी हैं क्योंकि रेलवे की फ्रेट रेवेन्यू घटी है और वास्तविक सरप्लस अनुमान से भी बहुत कम आया है. ममता ने यात्री एवं मालभाड़े में वृद्धि को तनिक भी नहीं छुआ है. उन्होंने इसे 'इन्नोवेटिव' (खोजपूर्ण या प्रगतिशील) बजट बताते हुए रेलवे की वर्तमान स्थिति पर श्वेत पत्र लाने की भी घोषणा कर दी, जबकि उन्होंने उन रिफाम्र्स को भी ज्यादा नहीं छुआ जिनकी चर्चा मात्र एक दिन पहले ही आर्थिक सर्वेक्षण में की गई थी.

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने एक-दो रिफॉम्र्स को देखकर भले ही ममता को बेहतर बजट देने के लिए शाबाशी दे डाली है, इसका कारण शायद बजट में कुछ नई लाइनों और संरक्षा तथा पैसा बचाने वाले आधुनिकीकरण की चर्चा से रेलवे वित्त की व्यवस्थित व्यवस्था करने के लिए उनका दिल बाग-बाग हो उठा था. जबकि रेलवे पर बाजार कर्ज और अईआरएफसी के टैक्स फ्री बांड्स का 9170 करोड़ रु. का बोझ लदा हुआ है. इसके बावजूद लोकप्रियता हासिल करने के लिए इतनी बड़ी कीमत रेलवे को चुकानी पड़ रही है. तो इसके लिए सिर्फ ममता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

इसके अलावा कांग्रेस भी अब ममता के राजनीतिक प्लान में सहभागी हो गई है और इस तरह प. बंगाल में वामपंथियों को सत्ता से बाहर करने में अब शायद तृणमूल कांग्रेस कामयाब हो जाएगी. कांग्रेसी नेता भी शायद इस सच्चाई से वाकिफ हैं और इसलिए वे रेलवे की जमीनी सच्चाइयों से अपनी नजरें चुरा रहे हैं. दूसरी तरफ वामपंथियों और राजद अध्यक्ष पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव को निशाना बनाते समय ममता ने अपने बजट भाषण में कोई कसर बाकी नहीं रखी जबकि भाजपा सीटों की तरफ से उनके खिलाफ कोई खास प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की गई. हालांकि बजट की बड़े पैमाने पर आलोचना हो सकती थी, मगर थोक में घोषित नहीं ट्रेनों, नयी लाइनों, नये स्टेशनों, विश्वस्तरीय और आदर्श स्टेशनों तथा नये अस्पतालों की घोषणा के बीच इसकी आलोचना कहीं खो गई थी.

अन्य विपक्षी दलों ने तो ममता के बजट पर थोड़ी बहुत प्रतिक्रिया व्यक्त भी की परंतु इस मामले में भाजपा का मुंह लगभग बंद ही रहा. बाद में वामपंथियों ने यह अवश्य कहा कि बजट में रेल संपत्तियों के बदलाव (अपग्रेडेशन) के लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं किया गया है. वामपंथियों का यह भी कहना था कि वर्ष 1970 से जो परियोजनाएं पास हैं, वह आज तक पूरी नहीं हो पाई हैं, जबकि रेलमंत्री ने अन्य और तमाम नई योजनाएं घोषित कर दी हैं. उन्होंने यह भी कहा कि बजट तो ठीक है परंतु बंगाल पैकेज के लिए पैसा कहां से आएगा?

प. बंगाल को वर्ष 2009-10 के रेल बजट में अधिकतम हिस्सा दिया गया है, फिर वह चाहे नई ट्रेनें हों, फैक्टरियां हों, नई लाइनों और स्टेशनों के विकास का सर्वेक्षण हो, रेलमंत्री ममता बनर्जी ने बंगाल का विकास करने के मामले में प. बंगाल से पूर्व रेलमंत्री एबीए गनी खान चौधरी को भी पीछे छोड़ दिया है. उनके बजट का बारीकी से अध्ययन करने पर पता चलता है कि वे उन क्षेत्रों के प्रति ज्यादा मेहरबान रही हैं जहां से उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में सबसे ज्यादा बढ़त मिली है. इसके लिए उन्होंने अल्पसंख्यकों, युवाओं और समाज के कमजोर तबके का सहारा लेते हुए कोलकाता दक्षिण के अपने संसदीय क्षेत्र पर भी पर्याप्त रेल परियोजनाओं की बौछार की है. उन्होंने इसके साथ ही गठबंधन भागीदार कांग्रेस को भी खुश करने की भरपूर कोशिश की है. ममता के रेल बजट में अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा उत्तर बंगाल को सर्वाधिक लाभ मिला है.

इस संबंध में बोर्ड के एक अधिकारी का कहना था कि बजट में किए गए तमाम सुनहरे वादों के बावजूद सवाल यह है कि इन सबके लिए पैसा कहां से आएगा, क्योंकि बजट में इनके लिए पूंजी स्रोतों का कोई उल्लेख नहीं किया गया है. अधिकारी का कहना था कि इससे जाहिर होता है कि इस प्रकार तात्कालिक लोकप्रियता तो मिल सकती है परंतु दीर्घावधि में इन पारियोजनाओं का कोई जमीनी भविष्य नहीं है. अधिकारी ने कहा कि पूर्व रेलमंत्री की ऐसी ही लोक लुभावन घोषणाओं का हश्र वर्तमान में सबके सामने है, जिसके कारण ही वह आज संसद में 24 की संख्या से सिकुड़कर सिर्फ 4 में आ गए हैं।
भावी प्रगति और लोकप्रियता की मजबूरी

रेलमंत्री ममता बनर्जी द्वारा कई लोकप्रिय कदमों की घोषणा और वित्तीय स्तर पर प्रभावित भारतीय रेलों के कामकाज के दबाव में चालू वित्त वर्ष के दौरान किए जाने वाले निवेश पर भा.रे. की भावी प्रगति और क्रियाशीलता तय होने वाली है. यह बात निर्धारित आयूसीमा पार कर चुकी रेल संपत्तियों के बदलाव के लिए आवंटित राशि को देखने मात्र से समझ में आ जाती है. ऐसी संपत्तियों (असेट्स) के रिप्लेसमेंट हेतु चालू वर्ष 2009-10 के लिए डेप्रिसेशन रिजर्व फंड को 1675 करोड़ से बढ़ाकर 5325 करोड़ रु. किया गया जबकि यह पिछले वित्त वर्ष 2008-09 में 7000 करोड़ रु. का था. इसके अलावा कैपिटल फंड, जो कि भा. रे. के रिजर्व को बढ़ाता है, को भी चालू वित्त वर्ष के दौरान कुल 4322 करोड़ रु. से घटाकर मात्र 642 करोड़ रु. कर दिया गया है जबकि गत वित्त वर्ष 2008-09 में यह 4965 करोड़ रु. था.

तथापि केंद्र सरकार को दिए जाने वाले लाभांश को 768 करोड़ रु. से बढ़ाकर 5479 करोड़ रु. कर दिया गया है, जबकि 6वें वेतन आयोग को लागू किए जाने से भा.रे. भारी वित्तीय दबाव में है और दूसरी तरफ कैश सरप्लस में भी 3000 करोड़ रु. की कमी आई है. रेलवे के कैश सरप्लस में पिछले वर्ष 2008-09 के 17400 करोड़ रु. की अपेक्षा चालू वर्ष 2009-10 में घटकर 14201 करोड़ रु. होने का अनुमान लगाया गया है. इसके अलावा रेलवे का निवेश योग्य सरप्लस पिछले वर्ष 2008-09 के 13532 करोड़ रु. की अपेक्षा चालू वर्ष 2009-10 में 36 प्रतिशत गिरकर 8631 करोड़ रु. रह जाने की संभावना है.

सच्चाई यह है कि पिछले दो वर्षों में रेलवे की वित्तीय स्थिति काफी तेजी से खराब हुई है. मगर देश के सामने पूर्व रेलमंत्री द्वारा लोक लुभावन और बनावटी आंकड़े पेश करते हुए लगातार वाहवाही लूटी जाती रही तथा स्वयं का विश्व के सामने मैनेजमेंट गुरु (?) और भा. रे. के टर्नएराउंड के अविष्कर्ता के रुप में प्रस्तुत किया जाता रहा. वर्ष 2007-08 में जहां भा. रे. की परिचालन लागत (ऑपरेटिंग रेशियो) इसकी कुल रेवेन्यू अर्निंग्स की 75.9 प्रतिशत थी, वहीं ïवर्ष 2009-10 में यह 92.5 प्रतिशत रहने वाली है. हालांकि पिछले वर्ष इसके तथाकथित मैनेजमेंट गुरु और टर्नएराउंड आविष्कर्ता ने यह आंकड़ा फर्जी तौर पर 78 प्रतिशत बताकर देश को दिग्भ्रमित किया था जबकि गत वर्ष 2008-09 के लिए अब यह 88.3 प्रतिशत रहा बताया जा रहा है. हालांकि भा.रे. की इस खराब हालत के लिए 6 वें वेतन आयोग के लागू होने के कारण इसके बढ़े हुए वेतन बोझ को बताया जा रहा है.

रेलमंत्री ममता बनर्जी के अनुसार 6 वें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने के लिए वर्ष 2008-09 में रेलवे को अपने कर्मचारियों के वेतन मद में 13600 करोड़ रु. खर्च करने पड़े थे जबकि वर्ष 2009-10 में 14600 करोड़ रु. अभी उनके बचे हुए 60 प्रतिशत एरियर्स आदि को देने में खर्च होने वाले हैं. हालांकि 15800 करोड़ रु. के बढ़े हुए बजटरी सहयोग के कारण रेलवे ने अपने योजना खर्च में 10 प्रतिशत की वृद्धि करते हुए 40,745 करोड़ रु. से चालू वित्त वर्ष में नई लाइनों और गेज कन्वर्जन की महती योजना बनाई है. ममता बनर्जी ने बताया कि जब उन्हें ज्ञात हुआ कि 11वीं पंचवार्षीय योजना में प्रावधान के मुताबिक भा.रे. को कम बजटरी सहयोग मिला है, तो उन्होंने इस मामले को प्रधानमंत्री के स्तर पर उठाया जिन्होंने तुरंत अंतरिम रेल बजट में प्रस्तावित बजटरी सहयोग से 5000 करोड़ रु. अतिरिक्त दिए जाने की मंजूरी प्रदान कर दी.

खानपान आउटसोर्सिंग समाप्त करना-कभी लागू नहीं होगा
रेलमंत्री ममता बनर्जी ने रेलवे खानपान सेवाओं, खास तौर पर पैंट्री कारों, की आउटसोर्सिंग समाप्त करने की घोषणा की है, और कहा है कि पैंट्री कारों को निकालकर उनकी जगह गाडिय़ों में एक यात्री कोच लगाया जायेगा जिससे काफी संख्या में यात्रियों को कन्फर्म बर्थ मिल सकेगी. ममता का विचार तो बहुत अच्छा है और इससे निश्चित तौर पर कुछ हजार यात्रियों को राहत मिल सकती है. परंतु उन्हें यह कौन बतायेगा कि सिर के बाल मुंड़ा देने भर से मुर्दा हल्का नहीं हो जाता. जहां भा.रे. में प्रतिदिन यात्रा करने वाले करीब 1.80 करोड़ यात्रियों को आज भी पर्याप्त रुप से स्वच्छ और सुरक्षित भोजन-पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है, वहां गाडियों से 100-200 पैंट्री कारें निकाल दिए जाने से क्या यात्रियों की मुसीबत और नहीं बढ़ जायेगी? इसके अलावा जो सैंकड़ों करोड़ रुपया लाइसेंस फीस के रुप में निजी खानपान ठेकेदारों द्वारा भा.रे. को आज मिल रहा है, उसकी भरपाई कहां से की जायेगी?

'रेलवे समाचार' का मानना है कि भविष्य में होने वाली प्रगति और कई लोक-लुभावन घोषणाएं करके आम जनता को दिग्भ्रमित करना और इस तरह लोकप्रियता हासिल करने की प्रवृत्ति से मंत्रियों को बाज आना चाहिए, क्योंकि यदि इस तरह की लोकप्रियता से दीर्घाविध राजनीतिक लाभ मिलता तो इसी तरह विश्व स्तरीय लोकप्रियता हासिल करके भा.रे. के टर्नएराउंड का ढिंढोरा पीटकर तथाकथित मैनेजमेंट गुरू बनने वाले पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव का उनके गृह प्रदेश बिहार में पिछले लोकसभा चुनावों में सूपड़ा साफ नहीं होता और उनकी जोकर छाप नौटंकी बंद नहीं होती. ममता बनर्जी यदि रेलवे खानपान सेवा सुधारने के लिए कड़े कदम उठाने की बात करतीं तो शायद इसका एक सही संदेश जाता, मगर आउटसोर्सिंग का कोई विकल्प तय किए बिना इसे समाप्त किए जाने की उनकी घोषणा न सिर्फ हास्यास्पद साबित होगी, बल्कि इसे वास्तविक धरातल में वह अपने पांच साल के कार्यकाल, यदि पूरा किया तो, में भी नहीं उतार पायेंगी. यह तय है. जबकि इस दरम्यान वर्ष 2011 के मध्य में होने वाले प. बंगाल के विधानसभा चुनाव जीतकर वह वहां की मुख्यमंत्री बनने की तैयारी कर रही हैं.

रेल खानपान व्यवस्था की आउटसोर्सिंग समाप्त करने का मतलब होगा आईआरसीटीसी को समाप्त करना, जिसकी स्थापना ही इसीलिए की गई थी. इससे बेहतर यह होगा कि आईआरसीटीसी में गये रेलवे अधिकारियों की नकेल कसी जाये और वहां कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार अधिकारियों को नियुक्त किया जाये. जबकि अब तक स्थिति यह रही है कि यहां एकाध को छोड़कर अधिकांश अधिकारी भ्रष्ट और बेहद बेईमान किस्म के रहे हैं, या हैं. ऐसा होने के कारण ही इस क्षेत्र में स्थिति ज्यो कि त्यों है. बल्कि यह कहा जाये कि इन कुछ बेईमान अधिकारियों के कारण ही रेलवे की खानपान व्यवस्था की स्थिति और भी बद से बदतर हुई है, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.
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मुझे चुनाव जीतने के लिए बजट की जरूरत नहीं-ममता

नयी दिल्ली : रेल बजट प्रस्तुत करने के बाद ट्रेनें के बजाय उसी दिन शाम 8-10 बजे की एयर इंडिया की उड़ान से कोलकाता जाने से पहले मीडिया से मुखातिब रेलमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि उन्हें प. बंगाल में विधान सभा चुनाव जीतने के लिए किसी बजट की जरूरत नहीं है. यह जबाब उन्होंने तब दिया जब मीडिया ने उनसे पूछा कि उन्होंने पं. बंगाल उन्मुख रेल बजट दिया है. उन्होंने कहा कि इसके लिए उन्हें कोई दोषी नहीं ठहरा सकता और न ऐसा कह सकता है. हमने कमोबेस सभी राज्यों और देश के सभी क्षेत्रों का अपने बजट में ख्याल रखा है. इसके साथ ही हमने प. बंगाल के लिए भी कुछ किया है. और कोई कारण नहीं है कि हम बंगाल को नजरअंदाज करते.

अच्छा बजट प्रस्तुत करने के लिए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की तारीफ और वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा पीट थपथपाकर शाबाशी पाने वाली रेलमंत्री से जब यह पूछा गया कि इससे पहले भी उन्होंने दो बार रेल बजट प्रस्तुत किया था. उनसे उनका वर्तमान बजट किस प्रकार भिन्न है. इस पर उनका कहना था कि अब हम ज्यादा परिपक्व और अनुभवी हुई हैं. इस बार जो हमने 15 दिन में किया है. वही इससे पहले करने में ज्यादा समय लगता था. ममता से जब मीडिया कर्मियों ने यह कहा कि सीपीएम वालों का कहना है कि आपने यह बजट अपने चुनावी घोषणा पत्र के तौर पर प्रस्तुत किया है. इस पर आपका क्या कहना है, तो इस पर भड़कने के बजाय उन्होंने हंसते हुए कहा कि चुनाव का क्या है वह तो इसी साल 2009 में भी हो सकते हैं. इसके बाद अपनी हंसी को रोककर थोड़ा गंभीर होते हुए उन्होंने कहा कि बंगाल के लोग अब सीपीएम शासन से बुरी तरह ऊब चुके हैं और जब भी चुनाव होंगे वे उन्हें सत्ता से बाहर करने के लिए उतावले हो रहे हैं. ममता ने कहा कि उन्हें चुनाव जीतने के लिए रेल बजट की जरूरत नहीं है. ममता ने अपनी स्टाइल में कहा कि सीपीएम वालों को अब बोलना बंद करके आराम करना चाहिए और इसके लिए हम उन्हें रेस्ट हाउस उपलब्ध कराने के लिए तैयार हैं.

उनसे जब यह पूछा गया कि पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव भी उनके खिलाफ बोल रहे हैं, तो उन्होंने हाथ जोड़ते हुए कहा कि वह उनके बारे में कुछ भी नहीं कहना चाहती है. तत्पश्चात जब उनसे यह पूछा गया कि आपका बजट रेलवे को आर्थिक रुप से मजबूत बनाने के बजाय सामाजिक प्रतिबद्धता की तरफ ज्यादा से ज्यादा झुका नजर आ रहा है, ऐसे में यह कितना सार्थक हो पायेगा, इस बारे में आपका क्या कहना है. इस पर ममता बनर्जी का कहना था कि सामाजिक प्रतिबद्धता आॢथक विकास के आड़े नहीं आती. मेरा आधारभूत दर्शन मां, माटी और मानुष है और यह दर्शन आर्थिक विकास के खिलाफ नहीं है. उनका कहना था कि इसीलिए आप्टिक फाइबर प्रोजेक्ट के लिए उन्होंने सैम पित्रोदा को लिया है और पीपीपी मॉडेल पर विचार किया है तथा उद्योगों के विकास के लिए लैंड बैंक प्रोजेक्ट शुरू करने जा रही हैं. जिससे रेलवे के लिए पर्याप्त रेवेन्यू प्राप्त होगी.

उन्होंने आगे कहा कि फ्रेट कॉरिडोर प्रोजेक्ट को गति दी जा रही है जो कि विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों और बाजारों को जोड़ेगा. इसके लिए बजट से पहले फिक्की एवं सीआईआई के तमाम उद्योगपतियों/पदाधिकारियों ने मीटिंग में अपनी चिंताएं जाहिर की थीं. इसके अलावा कोल्ड स्टोरेज सुविधा उपलब्ध कराने का विचार भी आया है. उन्होंने कहा कि आज जब चौतरफा आर्थिक मंदी का दौर चल रहा है तब उन्होंने भी वही किया है जो वक्त की मांग के अनुसार विश्वभर में किया जा रहा है. ममता ने कहा कि आम आदमी के लिए 'इज्जत और मुश्किल आसान' जैसी सामान्य सुविधांए प्रदान करने से रेलवे पर किसी प्रकार का अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा.
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उद्योंगों की विरोधी नहीं ममता
कोलकाता : अपने मां, माटी, मानुष के लोकप्रिय नारे पर सवार होकर करीब आठ साल बाद तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमों ममता बनर्जी ने रेल बजट के जरिए स्थापित उद्योग विरोधी अपनी छवि को बदलने का पूरा प्रयास किया है जिसमें वह काफी हद तक कामयाब भी रही हैं. प. बंगाल पर कई रेल परियोजनाओं और रेलगाडिय़ों की बौछार करते हुए उन्होंने अपने दिमाग में कहीं न कहीं वर्ष 2011 में होनेवाले प. बंगाल विधान सभा चुनावों को भी ध्यान में रखा है. उनका बजट भाषण नई ढ़ांचागत परियोजनाओं और औद्योगिक प्रस्तावों से भरा है तथा मजबूत प्रगति के प्रति आम आदमी को आश्वस्त कर रहा है, जोकि नंदीग्राम और सिंगूर में उद्योंगों के लिए जमीन अधिग्रहण के समय बनी ममता बनर्जी की उद्योग विरोधी छवि से एकदम अलग है.

संसद में रेलवे बजट प्रस्तुत करते समय ममता बनर्जी जो भी कह रही थीं, वह वास्तव में प. बंगाल में बुद्धदेव भट्टïाचार्य के विकल्प के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करने जैसा था. उन्होंने बजट भाषण में जमीन और उद्योगों सहित अतिरिक्त रेलवे जमीन पर ढ़ांचागत विकास के अलावा रेलवे को अतिरिक्त जमीन की पहचान और उसके दोहन के लिए लैंड बैंक की स्थापना आदि का उल्लेख किया. प. बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उनकी नजर होने और अपनी उद्योग विरोधी पुरानी छवि से निजात पाने के लिए ममता के पास यह एक अच्छा अवसर था. इसके अलावा उन्होंने यह कहकर अपनी इस छवि में एक तड़का और लगा दिया कि डंकुनी तक प्रस्तावित फ्रेंट कारीडोर के लिए यदि जरूरत पड़ी तो और जमीन का अधिग्रहण किया जायेगा जिससे वहां अन्य औद्योगिक इकाईयों की स्थापना की जा सकेगी.

प. बंगाल में खराब विपणन एवं स्टोरेज नेटवर्क का उल्लेख अपने बजट भाषण में करते हुए ममता बनर्जी ने कुछ समय से लगातार चर्चा में रहे इस राजनीतिक मुद्दे को भी छेड़ दिया. जब मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टïाचार्य इस नेटवर्क की स्थापना के लिए निजी क्षेत्रों को बुलाने की तैयारी कर रहे थे, तब ममता द्वारा वहां जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं के लिए तापमान नियंत्रित कार्गो सेंटर्स और कोल्ड स्टोरेज की स्थापना किए जाने की घोषणा ने वर्तमान मुख्यमंत्री से एक महत्त्वपूर्ण स्थानीय मुद्दा छिनकर ममता के हाथों में चला गया है जिसने उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी के और नजदीक पहुंचा दिया है.

इस संबंध में सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेस के डायरेक्टर सुगत मरजीत ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि कुल मिलाकर यह एक सकारात्मक रेल बजट है. रेलमंत्री ने बंगाल के लिए विभिन्न रेल परियोजनाओं की घोषणा की है, जिनके बारे में पहले से ही लोगों को पूरी उम्मीद थी. रेलमंत्री ने ढांचागत विकास और संरचनात्मक निर्माण को आगे बढ़ाने का भरपूर प्रयास किया है और इसका पूरा आश्वासन अपने बजट में दिया है. उन्होंने कहा कि परंतु मेरा मानना है कि ममता को अपने ये आश्वासन पूरा करने के लिए उनके पूर्ववर्ती लालू प्रसाद यादव अवश्य सरप्लस फंड उनके लिए छोड़ गये होंगे, क्योंकि बिना पर्याप्त सरप्लस के, और वह भी बिना माल एवं यात्री किराए बढ़ाए, यह तमाम प्रोजेक्ट पूरा कर पाना शायद संभव नहीं हो पायेगा.
हवाई कंपनियां बनाम भारतीय रेल

मुंबई : रेलमंत्री ममता बनर्जी की महत्त्वाकांक्षी नॉन-स्टाफ गाडियां जो कि बड़े शहरों से दिल्ली को जोड़ेंगी, कम किराये वाली हवाई कंपनियों (एलसीसी) के सामने एक बड़ी चुनौती बनने जा रही हैं. पिछले करीब एक साल से एलसीसी सहित लगभग सभी हवाई कंपनियां अपने किराये बढ़ा रही हैं, जबकि उनके यह बढ़े हुए किराये उनके यात्रियों की घटती संख्या के रूप में सामने हैं. फिर भी हवाई कंपनियां यह मानकर चलती हैं कि ट्रेनों में यात्रा का समय अधिक लगता है और रेलवे में कन्फर्म टिकट मिल पाना काफी मुश्किल हो गया है. इसलिए उनके यात्रियों की संख्या में आने वाली गिरावट अस्थायी होती है.

इस संदर्भ में एक एलसीसी के मालिक का कहना था कि वह रेलमंत्री को धन्यवाद देते हैं कि उन्होंने यात्री किराये कम नहीं किए हैं और न ही बढ़ाये हैं, इससे हमारा ट्रैफिक ज्यादा नहीं घटेगा और न हमें ज्यादा नुकसान होगा. परंतु जब भी रेलमंत्री की यह सस्ती और नॉन स्टॉप ट्रेनें शुरू होंगी, इनसे हमें अवश्य काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा. उनका कहना था कि शुरुआत में एलसीसी के किराये ट्रेनों के थ्री एसी के बराबर और सेकंड एसी के किरायों से कम रखे गये थे. इससे एलसीसी को काफी सफलता मिली थी. हालांकि वह किराये अवास्तविक थे और एलसीसी को उन्हें जल्दी ही रिवाइज कराना पड़ा था. उनका कहना था जैसे ही एलसीसी के यह किराये बढऩे या रिवाइज होने शुरू हुए इसके यात्री पुन: ट्रेनों की तरफ मुडऩे लगे और हमें पिछले कई महीनों से नकारात्मक ग्रोथ का सामना करना पड़ रहा है.

एलसीसी ऑपरेटर्स का कहना है कि ज्यादा किराये के बावजूद लोगों ने एलसीसी को इसलिए पसंद किया है क्योंकि इससे यात्रा में समय काफी कम लगता है, उसकी तुलना ट्रेनों में लगने वाले समय से नहीं की जा सकती है. उनका कहना है कि नान स्टॉप गाडिय़ों का प्रस्ताव करके अब रेलमंत्री ममता बनर्जी उन क्षेत्रों को निशाने पर ले रही हैं जहां राजधानी शताब्दी ट्रेनों को किराये के मामले में हवाई कंपनियों के साथ काफी संघर्ष करना पड़ रहा है. ज्ञातव्य है कि रेल बजट में ममता ने दिल्ली से जम्मू, लखनऊ, कोलकाता, चेन्नई, इलाहाबाद, भुवनेश्वर और एर्नाकुलम जैसे महत्त्वपूर्ण महानगरों के लिए इन नॉन स्टॉप गाडियों को चलाने का प्रस्ताव किया है. इन ट्रेनों की सबसे खास बात यह होगी कि इनमें एसी और नॉन-एसी दोनों यात्रा श्रेणियां रहेंगी, जो हफ्ते में एक बार से तीन बार तक चलेंगी. इस संबंध में एयर इंडिया के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना था कि इन नॉन स्टॉप ट्रेनों के चलने में अभी वर्षों लग जायेंगे जबकि हमारी तो वर्तमान में सबसे बड़ी चिंता यही है कि इतने समय तक हमें अपने आपको जिंदा कैसे रखना है, यह सोचना पड़ रहा है.
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रेल बजट से वैगन और कोच
बनाने वाली
कंपनियां खुश

नयी दिल्ली : रेलमंत्री ममता बनर्जी के रेल बजट में घोषित की गई पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप (पीपीपी) योजना से वैगन और कोच बनाने वाली कंपनियां काफी खुश हो गई हैं, क्योंकि उन्हें इस योजना के तहत अपने लिए असीम व्यावसायिक संभवानों नजर आ रही हैं. बम्बार्डियर, टीटागढ़ वैगन्स, जीसॅप और टेक्समेको जैसी निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियां रेल बजट में घोषित डबल डेकर इंटरसिटी एसी कोचों को लाने और 18000 नये वैगनों के चालू वर्ष 2009-10 के दौरान रेलवे द्वारा खरीदे जाने की योजना से अत्यंत उत्साहित हो गई हैं और इसमें से ज्यादा से ज्यादा हिस्सा मिलने की उम्मीद कर रही है.

इस बारे में बम्बार्डियर ट्रांसपोर्ट इंडिया के प्रबंध निर्देशक श्री राजीव ज्योति का कहना है कि विश्व स्तर पर हमारी कंपनी डबल डेकर कोच बनाने में अग्रणी है और जब भारत में डबल डेकर कोचों की यह प्रक्रिया शुरू होगी, हम इसके साथ ही खानपान सेवाओं में भी रेलवे की जरूरतों के मुताबिक अवश्य रुचि लेना चाहेंगे. उन्होंने बताया कि बम्बार्डियर की निर्माण इकाई (फैक्टरी) बड़ोदरा, गुजरात में स्थापित है, जहां मेट्रो ट्रेनों के लिए कोचों का निर्माण किया जाता है. यदि भा. रे. से कंपनी को डबल डेकर कोचों का ऑर्डर मिलता है, तो यह कोच भी वड़ोदरा में बनाये जा सकेंगे, क्योंकि हमारे पास इसकी पर्याप्त सुविधा और ढांचा मौजूद है.

टीटागढ़ा वैगन्स के प्रबंध निर्देशक श्री उमेश चौधरी का कहना है कि वैगनों का ज्यादा से ज्यादा सप्लाई ऑर्डर पाने के साथ ही हमारी योजना रेलवे की पीपीपी योजनाओं में भी बड़े पैमाने पर भागीदारी करने की है. उन्होंने बताया कि इसके अलावा हमारी कंपनी ने ईएमयू एवं अन्य यात्री कोच बनाने शुरू कर दिए हैं तथा इस क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा प्रगति पर हम अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि हमारी कंपनी टीटागढ़ वैगन्स, काचरापाड़ा, कोलकाता में स्थापित होने जा रही रेलवे कोच फैक्टरी में रेलवे के साथ संयुक्त उपक्रम के तहत यात्री कोचों के निर्माण सुविधा स्थापित करने के लिए प्रयास करेगी. उन्होंने बताया कि हम डंकुनी में लोकोमोटिव कम्पोनेंट्स पार्क स्थापित करने तथा रेलवे की विश्वस्तरीय स्टेशन निर्माण योजनाओं में भी भागीदारी करने के प्रति अत्यंत उत्सुक हैं.

के.के. बिड़ला ग्रुप की कंपनी टेक्समेको, जो कि रेलवे के लिए विभिन्न प्रकार की मशीनों और फ्रेटकारों का निर्माण करती है, को भी रेलवे से अतिरिक्त बिजनेस मिलने की उम्मीद है. कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) श्री रमेश महेश्वरी को पूरी उम्मीद है कि रेलवे के विश्वस्तरीय स्टेशन प्रोजेक्ट में से काफी व्यवसायिक हिस्सा उनकी कंपनी को अवश्य मिलेगा. उन्होंने अपने इस विश्वास का आधार यह बताया कि उनकी कंपनी द्वारा पहले से ही दिल्ली स्टेशन के आधुनिकीकरण की योजना में काम किया जा रहा है और हम अब अन्य स्टेशनों के लिए भी बोली लगायेंगे. श्री महेश्वरी ने बताया कि हम काचरापाडा़ रेल प्रोजेक्ट के लिए अपनी ज्वाइंट वेंचर पार्टनर ऑस्ट्रेलिया की यूनाइटेड रेल की विशेषज्ञता को यात्री कोचों के निर्माण की इस महती योजना के लिए उपयोग में लायेंगे. रुइया समूह की जीसॉप कंपनी के चेयरमैन श्री पी.के.रुइया ने कहा कि उनकी कंपनी वर्षों से रेलवे के लिए ईएमयू कोचों का निर्माण कर रही है. इसलिए उनकी कंपनी अपने दीर्घ अनुभव के बल पर इस क्षेत्र में अपना बिजनेस शेयर अवश्य हासिल करेगी. ज्ञातव्य है कि जीसॉप वैगन और कोच निर्माण क्षेत्र की एक पुरानी स्थापित एवं जानी मानी कंपनी है.
ममतामयी रेल बजट
ममता ने लालू के 'सरप्लस' गुब्बारे में चुभा दी पिन
रेलमंत्री ममता बनर्जी का रेल बजट भले ही 'बंगाल उन्मुख बजट' हो मगर इसमें समाज के छोटे से छोटे तबके का ख्याल रखने की कोशिश की गई है. साथ ही बिहार को थोड़ा-सा झटका देने के अलावा देश के लगभग हर कोने को भी इस बजट में छूने का प्रयास किया गया है. इसके अलावा पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव के 'सरप्लस' गुब्बारे में पिन चुभा दी गई है. 'तत्काल' बुकिंग को 5 दिन से कम करके 2 दिन और गंतव्य आधारित किराया तथा 150 रु. से घटाकर 100 रु. प्रीमियम करने, 14 नॉन-स्टाप ट्रेनें, डबल डेकर ऐसी कोच, मान्यताप्राप्त पत्रकारों को किराये में 50 प्रतिशत छूट सहित साल में एक बार इस छूट पर अपनी पत्नी को भी ले जाने की बढ़ी हुई सुविधा, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई में महिला विशेष उपनगरीय गाडिय़ां, डाकघरों एवं मोबाइल वैनों से रेल टिकट जारी करने, क्षेत्रीय जनता खाना, 1500 रु. मासिक आय वाले समाज के कमजोर तबकों को 100 कि.मी. तक की यात्रा के लिए मात्र 25 रु. में मासिक रेल पास, कम किराये वाली सिर्फ बैठने की सुविधा के साथ युवा ट्रेनें, जो मुख्य शहरों के बीच चलेंगी और युवा आबादी में लोकप्रिय होंगी, 50 विश्व स्तरीय स्टेशन और 375 मॅडल स्टेशन बनाए जाने की घोषणा, कई नई लाइनों सर्वेक्षणों और गेज कन्वर्जन योजनाओं की घोषणा से उद्योगों को प्रोत्साहन यानी आम जनता को ममता ने बहुत कुछ दिया है. परंतु यह सब लंबे समय की भावी प्रगति के बल पर तात्कालिक लोकप्रियता पाने का प्रयास कहा जा सकता है. परंतु इसमें भारतीय रेल को शायद कुछ नहीं मिल पाया है.

तत्काल बुकिंग में आम आदमी को थोड़ी तत्काल राहत मिल सकती है. इसका प्रीमियम घटाने का लाभ भी उसे मिलेगा. मगर 14 नॉन स्टाप गाडिय़ां, युवा गाडिय़ां, डबल डेकर एसी कोचों वाली गाडिय़ां और विश्व स्तरीय एवं मॉडल स्टेशन, काचरापाड़ा में प्रस्तावित नई फैक्टरी, बजट में घोषित नई रेल परियोजनाएं आदि दीर्घावधि की योजनाएं हैं. इन्हें मूर्त रूप देने में समय लगेगा. हां कोलकाता, दिल्ली, चेन्नई में उपनगरीय महिला विशेष गाडिय़ां भी जल्दी चलाई जा सकती है क्योंकि इसके लिए वहां सिर्फ किसी एक लोकल ट्रेन में 'महिला विशेष' का स्टीकर ही लगाना होगा. मगर 14 नॉन स्टाप ट्रेनों की प्लानिंग, कोचिंग, पाथ, समय, मेंटीनेंस आदि की व्यवस्था करके इन्हें तुरंत शुरू कर पाना थोड़ा मुश्किल होगा. हालांकि नान स्टाप ट्रेनों की अपेक्षा युवा ट्रेनें चलाना काफी सरल होगा. क्योंकि अनारक्षित ट्रेनों के रूप में पीक सीजन के दौरान इनके ट्रायल/परीक्षण हो चुके हैं और युवा जनता के लिए ये जनता ट्रेनें 'नई बोतल में पुरानी शराब' की तर्ज पर रेलवे के चालाक बाबुओं ने 'आम आदमी' के सामने परोस दी हैं.

कुछ डाकघरों से रेल टिकट बेचने की व्यवस्था पहले से ही कार्यरत है. हां इनका विस्तार हो सकता है. इस विस्तार में मोबाइल वैनों से घूम-घूमकर रेल टिकट बेचना भी शामिल है. यह एकदम बचकाना आइडिया रेलवे के बाबुओं का ही हो सकता है. मंत्री को यह समझना चाहिए कि जब रेलवे में कन्फर्म सीटों की मांग में और उपलब्धता में जमीन-आसमान का अंतर है, वहां सिर्फ टिकट देने की सुविधा बढ़ा देने भर से क्या होने वाला है? इससे गाडिय़ों की प्रतीक्षा सूची और प्लेटफार्मों पर भीड़ बढ़ाने के अलावा और क्या हासिल होगा? डाकघरों में रेल टिकट बेचने की व्यवस्था से तो रेलवे डाक कर्मियों की रोजी और डाकघरों को बचाने में डाक विभाग की मदद कर रहा है जो कि मोबाइल, इंटरनेट, ईमेल और कूरियर क्रांति के चलते लगभग वीरान होते जा रहे हैं. मगर मोबाइल वैन से टिकट बेचना तो निहायत बचकाना विचार है क्योंकि जहां बुकिंग कार्यालयों में रेलवे के पास पर्याप्त बुकिंग क्लर्क नहीं हैं, वहां इन मोबाइल वैनों के लिए स्टाफ की अतिरिक्त व्यवस्था रेलवे कहां से करेगा? इसका मतलब यह है कि अनारक्षित टिकटिंग को जिस तरह निजी क्षेत्रों को दिया गया है और दिया जा रहा है, उसी तरह इन मोबाइल वैनों के लिए भी निजी क्षेत्रों को बुलाया जाएगा.

डबल डेकर एसी कोच वाली गाडिय़ां चलाने का विचार नया और अच्छा है परंतु एक तो इन कोचों के निर्माण और सप्लाई में समय लगेगा क्योंकि देश में पहले से स्थापित वैगन/कोच निर्माण इकाइयों के पास अभी ऐसे कोच निर्माण का ढांचा मौजूद नहीं है. निजी क्षेत्र की वैगन निर्माण कंपनियों को भी इसमें कुछ साल का समय लग जाएगा. तो डबल डेकर एसी कोचों वाली ट्रेनें दौडऩे में अभी काफी वक्त लग सकता है. इसके अलावा यह डबल डेकर ट्रेनें फिलहाल उन क्षेत्रों में ही चल पाएंगी, जो विद्युतीकृत नहीं हैं अथवा ओएचई को ऊपर उठाना पड़ेगा जो कि अत्यंत खर्चीला और फिलहाल नामुमकिन है. यही नहीं गैर विद्युतीकृत क्षेत्र में भी सुरंगों और पुराने जर्जर रेल पुलों की समस्या भी इस डबल डेकर योजना के आड़े आने वाली है और कोच की ऊंचाई बढ़ाए बिना वर्तमान स्टैंडर्ड कोच की ऊंचाई में ही डबल डेकर कोच बना पाना शायद मुमकिन नहीं हो पाएगा. इस बारे में भा.रे. के होशियार बाबू लोग आगे क्या करते हैं, यह तो समय आने पर ही पता चलेगा.

अच्छा हुआ कि ममता जी ने गरीब आदमी की न्यूनतम 'इज्जत' 1500 रु. आंकी है जबकि पदभार संभालते ही उन्होंने शुरुआत में 500 रु. मासिक आमदनी वाले लोगों को 20 रु. मासिक रेल पास दिए जाने की घोषणा की थी. अब 1500 रु. मासिक आय वालों को 100 कि.मी. तक की यात्रा के लिए मात्र 25 रु. में यह पास बिना किसी अन्य अधिभार के दिए जाने की बजट में घोषणा करके ममता जी ने समाज के निचले तबके की 'इज्जत' रख ली है. इससे यह तबका शहरों में ही रहने का आशियाना तलाशने के बजाय दिन भर अपना काम करके अपने मूल निवासों को वापस जा सकेगा. इससे बड़े शहरों की आबादी के संतुलन में भी निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा. बल्कि 'रेलवे समाचार' का तो यह सुझाव है कि वे अपने अगले बजट में इस सुविधा का 1500 से 5000 रु. प्रतिमाह कमाने वाले तबके तक विस्तार करें और इसकी दूरी 100 कि.मी. से दो-ढ़ाई सौ कि.मी. तक बढ़ाएं तथा इस पास की कीमत यदि 25, 50, 75 और 100 रु. मासिक की श्रेणी में बांट दें तो इससे न सिर्फ शहरों की बढ़ती आबादी को संतुलित करने में मदद मिलेगी बल्कि समाज के इस तबके को शहरों में अपना आशियाना बनाने की सोचने से भी निजात मिल जाएगी. अब आती है बात 1500 रु. मासिक आय के प्रमाणीकरण की, तो इसमें भारी भ्रष्टाचार की भी संभावना है और इसके चलते इस सुविधा का इसके वास्तविक हकदारों तक न पहुंच पाने की संभावना है. जिस तरह सरकार के 100 रु. में से मात्र 10 रु. ही वास्तविक जरूरतमंद तबके तक पहुंच पाते हैं और जिस तरह आरक्षण का लाभ आज तक वास्तविक तबके तक नहीं पहुंच पाया है और इसका फायदा इसके द्वारा मजबूत से मजबूत होते गए तबके तक ही सीमित होकर रह गया है. वैसे में इस योजना का फायदा इसके वास्तविक हकदारों तक पहुंचे, इसका ध्यान रखना भी व्यवस्था की जिम्मेदारी है.

अब रही बात मान्यताप्राप्त पत्रकारों को रेल किराये में 50 प्रतिशत की छूट देने की, तो यह एकदम गैर जरूरी है. क्योंकि कोई भी मान्यताप्राप्त पत्रकार न तो गरीब है और न ही अंधा-लूला-लंगड़ा अथवा मूक-बधिर है. बल्कि इन्हें आज ऊंचे दर्जे की सुविधाएं और मोटी तनख्वाहें मिल रही हैं. इसके अलावा समाज एवं व्यवस्था के अन्य क्षेत्रों की तरह इस क्षेत्र में भी भ्रष्टाचार और प्रशासनिक एवं राजनीतिक दलाली के गुण-दोष पर्याप्त मात्रा में आ गये हैं. इस क्षेत्र और अब इस सुविधा का विस्तार उनकी पत्नियों तक भी कर दिया गया है. यदि पत्रकारों को सरकार ऐसी कोई सुविधा देकर अपनी अनावश्यक आलोचना से बचना चाहती है और उसके लिए यह प्रलोभन है तो ठीक है, वरना उसे बड़े मीडिया हाउसों के पत्रकारों के बजाए क्षेत्रीय एवं भाषाई अखबारों के लगभग सभी सरकारी सुविधाओं से वंचित पत्रकारों को यह सुविधा देनी चाहिए. क्योंकि बड़े मीडिया हाउसों अथवा बड़े और राष्ट्रीय अखबारों के पत्रकारों को आने-जाने सहित अन्य सभी प्रकार के खर्चों का वहन उनके मीडिया समूहों द्वारा किया जाता है. ऊपर से उन्हें अतिरिक्त सरकारी सुविधाएं दिए जाने की कोई तुक नहीं है. इसके अलावा पत्रकारों को मान्यता प्रदान करने की सरकारी प्रक्रिया में भी बदलाव करना होगा. क्योंकि यह मान्यता स्थापित बड़े मीडिया समूहों और राष्ट्रीय अखबारों के पत्रकारों तक ही लगभग सीमित रहती है अथवा सरकार के पक्षधर या सरकारी भाटगीरी रने वालों को ही आसानी मिलती है, जबकि क्षेत्रीय एवं छोटे भाषाई अखबारों के पत्रकारों को यह मान्यता देने में राज्य सरकारों द्वारा गठित तत्संबंधी समितियां न सिर्फ आनाकानी करती हैं बल्कि उन्हें मान्यता देने में भेदभाव और अड़चनें पैदा की जाती हैं.
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ममता की तारीफ-ए-काबिल पहल

नयी दिल्ली : रेलवे भर्तियों में क्षेत्रीय/स्थानीय लोगों को 50 प्र.श. कोटा देने की घोषणा करके ममता बनर्जी ने एक साहसिक और तारीफ-ए-काबिल पहल की है. पिछले काफी समय से रेलवे भर्ती बोर्डों (आरआरबी) की परीक्षाओं में जगह-जगह विवाद और मारपीट की घटनाएं हुई हैं. महाराष्ट्र, उड़ीसा, कर्नाटक, आसाम, बिहार, प. बंगाल, राजस्थान आदि राज्यों में बाहरी परीक्षार्थियों-उम्मीदवारों के साथ बड़े पैमाने पर मारपीट की घटनाएं हुईं और इन घटनाओं का इस्तेमाल क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों द्वारा राजनीतिक लाभ उठाने में किया गया है. परंतु अब ममता बनर्जी की इस नायाब पहल से स्थानीय स्तर पर पनपने वाले सामाजिक असंतोष का पर्याप्त समाधान हो जाएगा. इसके अलावा इस प्रकार आबादी या कर्मचारियों को भी दूर-दराज जाकर नये सिरे से स्थापित होने से निजात मिलेगी तथा स्थानीय रहकर वे अपने परिवारों की भी देखभाल कर सकेंगे. हालांकि इसके अपने खतरे हैं, सो अलग.

रेल मंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि रेलवे की भर्तियों में स्थानीय लोगों के लिए 50 प्रतिशत कोटा रखा जाएगा. उन्होंने आरआरबी की कार्यप्रणाली और कामकाज के तौरतरीकों की समीक्षा किए जाने की भी घोषणा की है. लोकसभा में रेल बजट में दो दिन चली चर्चा का जवाब देते हुए रेलमंत्री ने यह घोषणाएं की हैं. उन्होंने रेलवे की खानपान व्यवस्था की आउटसोर्सिंग को भी समाप्त किए जाने की घोषणा की है. रेल मंत्री ने सांसदों की मांग पर अपने बजट प्रस्तावों में कुछ संशोधन करते हुए विश्वस्तरीय एवं आदर्श स्टेशनों, बहुउद्देश्यीय परिसरों वाले स्टेशनों तथा दुरंतो ट्रेनों की सूची में नये स्टेशन एवं ट्रेनें भी जोड़ी हैं. अब उन्होंने दुरंतो ट्रेनों की संख्या 12 से बढ़ाकर 14 कर दी है. अब दिल्ली-सिकंदराबाद और दिल्ली-नागपुर के लिए भी नॉन स्टाप दुरंतो ट्रेनें चलाई जाएंगी. रेलमंत्री ने कम से कम दो ऐसी ट्रेनें महीने भर के अंदर शुरू कर दिए जाने की बात भी कही है.

इसके साथ ही रेल मंत्री ने इंडियन पुलिस पदक पाने वालों, कलाकारों, चित्रकारों एवं सांस्कृतिक क्षेत्र के लोगों को भी यात्री किराये एवं राजधानी शताब्दी ट्रेनों में यात्रा के लिए 50 प्रतिशत छूट दिए जाने की घोषणा की है. संसद के दोनों सदनों में चली बहस का अलग-अलग जवाब देते हुए रेलमंत्री ने रेलवे की भावी कारोबारी योजना तैयार करने के लिए फिक्की के महासचिव श्री अमित मित्रा की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति गठित करने की भी घोषणा की है.

रेलमंत्री ममता बनर्जी ने स्थानीय लोगों की भावनाओं और आरआरबी परीक्षाओं में अक्सर होने वाले उपद्रवों को ध्यान में रखते हुए रेलवे भर्ती में स्थानीय लोगों को 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व दिए जाने की पुरजोर वकालत की है. ज्ञातव्य है कि हाल ही में कर्नाटक के बंगलोर एवं मैसूर में आरआरबी की परीक्षाओं के दौरान मारपीट की गई थी और बाहरी राज्यों से आये उम्मीदवारों का विरोध किया गया था. इससे पहले महाराष्ट्र, असम और राजस्थान में भी इस पर काफी हंगामा हो चुका है. जहां तमाम उम्मीदवारों की पिटाई की गई थी और इस विवाद ने राजनीतिक स्वरूप अख्तियार कर लिया था. इसे ही ध्यान में रखते हुए रेलमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि वैसे तो किसी भी अखिल भारतीय सेवा में स्थानीय कोटा का कोई प्रावधान नहीं है. देश भर में स्थित आरआरबी अपने दायरे में आने वाली रेलों के लिए परीक्षाएं आयोजित करते हैं, परंतु जब बाहरी उम्मीदवार परीक्षा देने पहुंचते हैं तो स्थानीय लोग हंगामा करते हैं. इसके नतीजे काफी खराब रहे हैं और स्थानीय नेता इसका राजनीतिक फायदा उठाते हैं.

उन्होंने कहा कि इसके निराकरण का यही उपाय हो सकता है कि या तो आरआरबी की परीक्षाएं एक खास दायरे में आयोजित करना बंद किया जाए और दूसरी अखिल भारतीय सेवाओं की तरह इनके परीक्षा केंद्र देश भर में हों अथवा इसका सबसे बेहतर तरीका यह हो सकता है कि रेलवे भर्तियों में स्थानीय लोगों को 50 प्र.श. कोटा दे दिया जाए. उन्होंने कहा कि इसीलिए हमने कोटा दिए जाने के उपाय को ज्यादा व्यावहारिक पाया है क्योंकि इससे रेल सेवाओं में प्रांतीय पक्षपात किए जाने का स्थानीय विवाद हमेशा के लिए खत्म हो सकता है.

पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के 90 हजार करोड़ रु. के सरप्लस पर सांसदों द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब देते हुए रेल मंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि रेलवे के तमाम खर्चों और लाभांश का आवंटन करने के बाद उनके पास कुल 8360 करोड़ रु. ही बचे हैं. भाजपा सांसद अनंत कुमार के इस अनुरोध पर कि रेलवे के पिछले पांच वर्षों के कार्यकाल पर श्वेतपत्र को संसद के शीतकालीन सत्र के पहले ही दिन सदन में पेश किया जाए, ममता बनर्जी ने कहा कि श्वेत पत्र वह जल्दी से जल्दी पेश करने की कोशिश करेंगी.

उल्लेखनीय है कि 'रेलवे समाचार' ने लालू यादव के भारतीय रेल के तथाकथित टर्न एराउंड एवं लाभ (सरप्लस) के आंकड़ों को हर बार दिग्भ्रमित करने और बढ़ा-चढ़ाकर बताये जाने के बारे में लगातार आवाज उठाई थी. अब ममता बनर्जी के रेल बजट ने उसकी पोल खोल दी है तथा बाकी रही-सही कसर श्वेत पत्र में खुल जाएगी. ज्ञातव्य है कि श्वेत पत्र लाए जाने की बात पर लालू यादव बुरी तरह से हड़बड़ाए हुए हैं और लगातार अपनी सफाई में बयान जारी कर रहे हैं.

Wednesday, 5 August 2009

Assam assures security for train
service in southern N0rth East


Agartala : Assam government has assured to provide all out support to ensure safe movement of passenger trains between Lumbding and Badarpur as well as conversion of railway tracks to broad gauge, a visiting cabinet team of Assam here today said.

A five member delegation including three ministers led by Assam's Revenue Minister Dr Bhumidhar Barman visited Tripura to see the functioning of Tripura Tribal Areas Autonomous District Council (TTAADC) constituted under the sixth schedule.

Dr Barman denied the allegation leveled against Assam govertment's lackadaisical attitude towards upgradation of train service in the trouble-torn N C Hill district of South Assam and inadequate security to Northeast Frontier Railway (NFR) for safe and frequent movement of train upto Badarpur.

There was no point of difference in development of Northeast or Tripura's demand of early extension of railway link up to Sabroom in South most point of Tripura besides, gauge conversion and accelerated growth of railway network in southern part of Assam.

''Our government has already taken several initiatives to crackdown the militant outfits in hill sections while regularly pursuing for upgradation of railway service including conversion of metre gauge to broad gauge in Southern part of Assam, Tripura and Mizoram,'' Dr Barman said.

If required the Assam government would definitely go for a joint appeal with Tripura to the Centre because they were very keen to overall development of Northeast, he claimed, adding that they would again discuss the issue in the cabinet.

The train service was disrupted when Black Widow rebels targeted a goods train on April 10, killing two security personnel and injuring another.

Earlier, train services in this section were suspended from May 15, 2008 after militants of the outfit went on a killing spree targeting railway employees and those of construction companies engaged in gauge conversion work.
Iron ore rakes movement on Indian East Coast to resume

It is reported that night movement of iron ore rakes on the 450 kilometer Kirandul to Kottavalasa line is to resume after having remained suspended for about a week.

According to East Coast Railway sources, the suspension was due to the week long celebration by the Maoists. For the past one week ECoR has been running on the K-K line 10/11 rakes a day on an average and that too during the day time only. In normal times, when night movement takes place, 14/15 rakes are operated a day. For several days in July, the average daily throughput along the line was around 10/11 rakes a day mainly due to heavy rains.

In fact, heavy rains had also hit coal loading at Talcher mines of Mahanadi Coalfields Ltd and also loading at three ports, namely, Paradip, Visakhapatnam and Gangavaram, served by ECoR. As a spokesman for ECoR pointed out, the daily average loading in July dropped to 3,750 wagons as against targeted 3,940.

Fortunately, the weather condition having improved, ECoR’s daily average loading of wagons too has now improved to 4,200 as compared with 3,900 in the same month last year.

Monday, 3 August 2009

Masjid Bridge To Go First, Other To Follow

Mumbai : Central Railway's DC-AC conversion plans have picked up pace and it's not just the old masjid road overbridge that has come in the way of its development plans in the city. Three road overbridges (ROBs) on the Matunga-Sion-Kurla stretch and five foot-overbridges (FOBs) between Kalyan and CST are posing a challenge to the railway authorities.

K K Sharma, chief administrative officer (construction), CR, said, "Five FOBs would need to be dismantled in connection with the DC-AC conversion and tenders for the same have been floated for consultancy and execution.''

Central Railway (CR) plans to bring down the ROB at the northern end of Masjid station during a 48-hour mega block, which will start after the last train leaves CST on August 14. It will facilitate not only conversion of the section from DC to AC, but also extension of the Main line platform to accommodate 12-car rakes and make room for a seventh track.

The DC-AC conversion may also result in three ROBs along the Matunga-Sion-Kurla stretch being removed. However, since the conversion is being carried out in phases, officials say the three ROBs need not immediately be demolished. CR, is also exploring several options to see if the work can be carried out without razing the bridges.

One option CR is looking at is keeping the section under the bridges "neutral''- in other words, have no current flow under the bridges. For AC-powered trains, a clearance of over 6 m is required between the tracks and bridges. "As span of the bridges is only 15 m, movement of trains will not be affected even if a pantograph is not drawing current as AC emits 25,000 volts,'' a senior official said. Nine-car rakes have three pantographs each while a fourth one is added to 12-car coaches.

Another option before CR is using insulators around the overhead wire so that the 6-m clearance is reduced and the bridges are saved. Officials are also looking at increasing the height of the bridges using jacks, but this may not be feasible as the possibility of material failure is high.

Senior CR officials also say lowering the level of tracks to maintain the 6-metre clearance is out of the question as these low-lying areas are prone to heavy waterlogging.

Trains running on AC current will not only be faster, the traction will also allow more services to be run, say officials. Under MUTP-I, DC-AC conversion on the stretch between Kalyan and Kasara has been completed while work on the section from Karjat to Kalyan is on and is expected to be completed by December-end. MUTP-II involves the stretch between CST and Thane; with this, the entire suburban section of CR will run on AC by 2011.

रेलवे : करोड़ों की भूमि पर निगाहें

अलीगढ़ : रेलवे की करोड़ों रुपये की भूमि पर भूमाफिया नजरें लगाए हैं। बेशकीमती जमीनों पर कब कब्जा हो जाए। इस बारे में रेलवे अफसर पूरी तरह बेखबर हैं। यह वह जमीन हैं जिन पर कभी तीन तालाब होता था और यहां से स्टीम इंजनों को पानी भरा जाता था।

रेलवे स्टेशन के पास शाहकमाल रोड पर तीन तालाब की जमीन इन दिनों बेकार पड़ी है। बता दें कि तीन तालाब में लगे टैंकों में भरे पानी से कानपुर से दिल्ली के बीच चलने वाली ट्रेनों में लगे स्टीम के इंजनों में पानी भरने की व्यवस्था होती थी। स्टीम इंजन के बाद डीजल और फिर इलेक्ट्रिक इंजन एक्सप्रेस ट्रेनों में लगे तो स्टीम इंजन का चलन पूरी तरह से बंद हो गया। रेलवे सूत्रों की मानें तो तीन तालाब से स्टीम इंजन को हर तीस-चालीस किलोमीटर बाद पानी की जरूरत होती थी। यही कारण था कि अलीगढ़ में तीन तालाब के बाद खुर्जा में भी तीन तालाब की स्थापना कर दी गई थी। मगर, अब इलेक्ट्रिक और डीजल इंजन आने के बाद तीन तालाब का महत्व पूरी तरह से खत्म हो गया। लोगों का कहना है कि अलीगढ़ के तीन तालाब जो फिलहाल करोड़ों रुपये की जमीन है, उसमें प्राइवेट लोगों ने दरवाजे निकाल लिए हैं। मकानों का दरवाजा तीन तालाब की ओर किए जाने पर रेलवे अधिकारियों ने कोई आपत्ति नहीं जताई। यही कारण है कि रेलवे की जमीन पर कब्जा करने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। यही नहीं भूमाफियाओं की निगाहें रेलवे की बेशकीमती जमीन पर हैं। ताकि मौका लगते ही जमीन पर कब्जा किया जा सके।

रेलवे की भूमि पर अस्थाई कब्जे हैं,मगर रेलवे भूमि को कब्जों से इंजीनियरिंग विभाग मुक्त नहीं करा सका है।

कठपुला के आसपास रेलवे की कीमती जमीन है। उक्त जमीन पर कई लोगों ने कब्जे कर लिए हैं। मगर,रेलवे अफसर इन अस्थाई और स्थाई कब्जों को नहीं हटा पा रही है। इस कारण बेशकीमती जमीन का कब्जा होने का खतरा पूरी तरह से मंडराने लगा है। उधर, रेलवे के यातायात प्रबंधक डी मिंज ने कहा कि तीन तालाब पर अधिकारियों के दफ्तरों के निर्माण प्रस्तावित हैं। रेलवे की जमीन पर कब्जे के सवाल पर उन्होंने बताया कि इस तरह का अभी तक कोई मामला संज्ञान में नहीं आया। अगर इस तरह की कोई बात है तो कब्जेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।